Saturday, December 31, 2011

नववर्ष आप सबके लिये मंगलमय हो



ऐसी हो हर सुबह आपकी
ऐसी ही हर शाम ।











हर पल मन को छूकर गुजरे
स्नेहिल अभिराम




Thursday, December 29, 2011

कुछ नही तो यही सही

आजकल कुछ नया नही सूझ रहा । इसलिये पुरानी रचनाओं को देकर ही रिक्ति-पूर्ति की जारही है । यहाँ यह लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना गीत है ।
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मेरे दिल का हाल ,न पूछो
कितना क्यूं बेहाल ,न पूछो
हर संवेदनशील आदमी
क्यूं रद्दी रूमाल ,न पूछो ।

क्या अपने क्या बेगाने
चाहा सबसे बस अपनापन
पर इस बस्ती में रहते हैं
सब कितने कंगाल ,न पूछो
मेरे दिल का हाल ,न पूछो।

करे कोई अपराध
सजा मिल जाती और किसी को
कैसे-कैसे मिल जाती है
हत्यारों को ढाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

केवल दर्द मिलेगा तुमको
जहां जुडोगे दिल से
ह्रदय की राहों में बिखरे हैं
कितने जंजाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

सब उगते सूरज के गायक
यह ढलती संन्ध्या का
साथी दुखी अकेलों का,
इस मन की उल्टी चाल पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

बूंद-बूंद को तरसे पाखी
धूल उडी आंखों में
उजडे शुष्क मरुस्थल में
अब कैसे नदिया-ताल ! न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो

Tuesday, December 20, 2011

सुख तथा कुछ और क्षणिकाएं

सुख
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(1)
सुख--
एक नकचढा मेहमान,
और मैं.....
झुग्गी-झोपडी वासी
अकिंचन मेजबान
उसे कहाँ बिठाऊँ !
कैसे सम्हालूँ !!
(2)
सुख--
चौराहे पर ,
कभी-कभी मिलजाने वाला
कोई परिचित्
तुरन्त एक यंत्र-चालित सी स्मित्
"क्या हाल हैं ?"
"ठीक हैं "
और फिर नितान्त अपरिचित्
(3)
सुख --
जैसे बीच सडक पर,
गैर-जिम्मेदार भाग्य द्वारा
चलते-खाते
लापरवाही से फेंका गया
छिलका ।
फिसलता है ,गिरता है
मन....बार-बार ,
होता है शर्मसार

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कुछ क्षणिकाएं
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(1)
पलटती रहती है
अतीत के पन्ने
बूढी हुई जिन्दगी ।
(2)
तुम हो आसपास
तो जीवित हैं
हर अहसास ।
(3)
स्नेह की ओट में
छुपालो
यूँ नफरत से बचालो ।
(4)
सुख
अगर सुख नही
तो दुख
बेशक दुख नही ।
(5)
प्रतीक्षा की धूप में
पत्ते पकने लगे
पल एक-एक कर
झरने लगे ।
(6)
गलत को नही कहा
तुमने गलत
तो फिर बेशक
तुम गलत ।
(7)
तुम हो चाहे
दुख का कारण
या दुख के कारण ।
हर समस्या का
तुम्ही हो निवारण ।
(8)
न कोई क्लाइमेक्स
न कलरफुल साइट
जिन्दगी का चित्र
केवल ब्लैक एण्ड व्हाइट ।
(9)
स्नेह का व्यापार
बेकार मन को
बढिया रोजगार

Monday, December 12, 2011

एक सुरमय सुरम्य पर्व


ग्वालियर को गालव ऋषि की तपोभूमि , वीरांगना लक्ष्मीबाई की अन्तिम कर्मभूमि के साथ तानसेन नगरी होने का गौरव भी मिला हुआ है ।
वही संगीत-सम्राट तानसेन जिनके लिये सूरदास जी ने कहा था-"विधना यह जिय जानिकै शेषहि दिये न कान ,धरा ,मेरु सब डोलिहैं तानसेन की तान ।" वही तानसेन जो अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे और वही तानसेन जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के पर्याय माने जाते हैं ।
तानसेन उनका नाम नही बल्कि उपाधि है जो बाँधवगढ के राजा रामचन्द्र ने उन्हें दी थी । कहते हैं कि उनका मूल नाम तन्ना मिश्र ( कुछ लोग पाण्डे भी कहते हैं ) था । उनका जन्म ग्वालियर के पास ही बेहट ग्राम में संवत् 1563 में हुआ था । उस समय ग्वालियर में कला निपुण संगीत रसिक राजा मानसिंह तोमर का शासन था इसलिये ग्वालियर संगीतकला का विख्यात केन्द्र था और बैजू बक्सू कर्ण और मेहमूद जैसे संगीताचार्य व गायक एकत्र थे । अनुमान है कि तानसेन ने इन्ही से प्रारम्भिक संगीत शिक्षा ली होगी । राजा मानसिंह के बाद वह संगीत-मण्डली बिखर गई और तानसेन वृन्दावन चले गए । वहाँ उन्होंने स्वामी हरिदास से संगीत की उच्चशिक्षा ली थी । बाद में अष्टछाप के संगीताचार्य गोविन्दस्वामी से भी गायन सीखा था । वे क्रमशः दौलत खाँ, राजा रामचन्द्र तथा अकबर के दरबार की शोभा रहे थे ।
तानसेन ध्रुपद शैली के विख्यात गायक व दीपक राग के विशेषज्ञ थे । जनश्रुति है कि जब वे दीपक राग गाते थे तब अग्नि प्रज्ज्विलित हो जाती थी । इस बात में कितना तथ्य है यह तो नही मालूम लेकिन यह तय है कि तानसेन को संगीत कला का पर्याय माना जाता है । उन्होंने संगीतसार व रागमाला नामक दो ग्रन्थों की तथा अनेक ध्रुपदों की रचना की । तानसेन की इस नगरी में किले के अलावा अनेक दर्शनीय मन्दिर मकबरे व दरगाह हैं(जिनसे आगे कभी परिचय करेंगे) जिनकी दीवारें और मीनारें आज भी जैसे गुनगुनातीं हैं । हर पत्थर से सुरों की झंकार गूँजती है और प्रतिवर्ष दिसम्बर माह में तो माटी का कण-कण राग-रंजित हो उठता है ,हवा का हर झोंका लय ताल में बहता है,जब तानसेन-समारोह में देश भर से शास्त्रीय संगीत के विशिष्ट कलाकार यहाँ आकर अपनी कला बिखेरते हैं और स्वयं को धन्य मानते हैं । यहाँ देश के लगभग सभी शीर्षस्थ और महान शास्त्रीय गायक प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं ।संगीत-सम्राट की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिये इस समारोह का आयोजन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत व कला अकादमी तथा मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् व संस्कृति विॆभाग करता है ।
बैजाताल का एक दृश्य---


इस बार 9 दिसम्बर से 12 दिसम्बर तक तानसेन--समारोह चला । यह 87 वां समारोह था । प्रतिवर्ष यह तानसेन के समाधि-स्थल (हजीरा) पर ही सम्पन्न होता था जहाँ मोहम्मद गौस का खूबसूरत मकबरा भी है । मोहम्मद गौस तानसेन के अत्यन्त श्रद्धास्पद थे । लेकिन इसबार यह समारोह बैजाताल पर सम्पन्न हुआ । ग्वालियर में अनेक प्राचीन इमारतों के अलावा ,सिन्धिया घराने का भी जो वास्तु-वैभव जहाँ-तहाँ बिखरा है, बैजाताल उसका एक सुन्दर उदाहरण है । समारोह में इसकी साज-सज्जा विशेष रूप से की गई ।
रात्रि के समय बैजाताल का दृश्य---


फिर भी कहा जासकता है कि संगीत कला है ,हृदय व आत्मा का विषय है । इसे बाहरी साज-सज्जा नही बल्कि कला-साधकों की प्रस्तुति विशिष्ट बनाती है । कलाकार साज-सज्जा से नही श्रोताओं के ध्यान से प्रभावित होता है । अन्तिम दिन सुरों की फुहारें बेहट गाँव की माटी को भिगोतीं हैं । आखिर संगीत का वह मधुर स्वप्न यहीं तो साकार हुआ था ।
इसबार बनारस घराने की प्रसिद्ध ख्याल व ठुमरी-गायिका सुश्री सविता देवी को तानसेन अलंकरण से अलंकृत किया गया । इनके अलावा श्री कमलकामले,गौरी पाठारे ,सलिल भट्ट समरेश चौधरी अश्विनी भिडे ,मोइनुद्दीन खाँ आदि प्रख्यात कलाकारों ने मनमोहक गायन-वादन से श्रोताओं को डुबोदिया । यहाँ बिहारी का यह दोहा प्रासंगिक है कि, "तन्त्री नाद ,कवित्त रस, सरस राग रति रंग,अनबूडे बूडे, तरै जे बूडे सब अंग ।"
तानसेन समारोह हर संगीत-प्रेमी के लिये एक अद्भुत सुरम्य सुरमय पर्व है । राग जैसे साकार होकर श्रोता को अपने कुहुक में बाँध लेते हैं और लेजाते हैं कहीं दूर किसी स्वप्न-लोक में ,जहाँ हम सिर्फ अपने साथ होते हैं ।

Thursday, December 8, 2011

पियक्कड

रात के लगभग ग्यारह बजे थे । पूरे मोहल्ले में ज्यादातर लोग सोगए थे । केवल ठाकुर धीरसिंह की हवेली से टी.वी. चलने की आवाज आरही थी या अपने साथ हुई किसी ज्यादती को याद कर, रह-रह कर रो उठते बच्चे की तरह गली में एक-दो कुत्ते भौंक उठते थे । अचानक गली में बलवा सा होता लगा । किसी औरत की चीख-पुकार, भाग--दौड ,गाली--गलौज ,बर्तन फेंकने की आवाज ...और मिली--जुली हुंकारें--
"मारो साले को ..हरामी कही का ..,'मूत' पीकर आए दिन नौटंकी दिखाता रहता है । धक्के मार कर बाहर करो ,माहौल खराब कर रहा है मोहल्ले का..पियक्कड साला...।"
देखा जाए तो इस मोहल्ले में इस तरह का माहौल कोई नया नही । शराब पीकर जरा-जरा सी बात पर कट्टा, तलवारें निकालना ,बोतल, ईंट और पत्थर फेंकना, औरतों को पीटना ,चीख-चीख कर माँ-बहन की गालियाँ देना आम रहा है । चूँकि ये लडाइयाँ पूरी तरह शुद्ध शाब्दिक और अहिंसक होती हैं, किसी को खरोंच तक नही आती सो लोग झगडों की ज्यादा चिन्ता नहीं करते । जिन्हें झगडे का तमाशा देखने में रुचि होती वे लोग दर्शक बन कर या बीच-बचाव का श्रेय लेने वहाँ पहुँच भी जाते ।
लेकिन यह झगडा न सिर्फ शाब्दिक था न ही शुद्ध रूप से अहिंसक ।
"यह सब किस्सू के कारण हो रहा है । जब से आया है आए दिन कुछ न कुछ फसाद होता ही रहता है ।" -लोग कह रहे थे । हालाँकि एक-दो लोग इसके लिये कंची( उसकी घरवाली) को जिम्मेदार मानते हैं ।
किस्सू यानी किसनलाल । गाँव से काम की तलाश में आया एक मजदूर । पर शहर में आकर उससे कोई काम न बना । किसी दुकान पर बैठा तो चीजें कम कीमत पर बेच दीं । हलवाई के यहाँ काम मिला तो दूध जला दिया या शक्कर की चासनी बनाने की बजाय बूरा बना दिया । और दूध बेचना शुरु किया तो भैंस वाला पहले ही इतना पानी मिला देता कि लाभ की जगह उसे शिकायतें व गालियाँ मिलीं । शरीर की हालत बिना पानी की फसल सी होगई है सो हम्माली या ईंट-गारा ढोने का काम तो कर नही सकता था । हाँ कभी-कभी किसी टेम्पोवाले का सहायक बन कर पाँच-पचास रुपए ले आता है । ज्यादा पढा-लिखा तो है नही । कुल मिला कर वह अब निकम्मे की उपाधि लेकर या तो अक्सर घर में बैठा घरवाली कंची और बेटी गुड्डन की , जिसकी उम्र रोम-रोम से वसन्त की कोंपल की तरह फूटने लगी है ,रखवाली करता रहता है या नुक्कड पर दिनभर ताश खेलते लोगों की चालें देखता रहता है । कंची लाली-पौडर लगाए देहरी में बैठी दिन भर बीडी बनाती है और उसे ताने और जली-कटी भी सुनाती रहती है ।
"कहाँ यह खूसट सा किस्सू और कहाँ बेचारी कंची , एकदम नरम लौकी सी । बन्दर के हाथों नारियल लगना और किसे कहते हैं ! शराबियों की औरतों की तो जिन्दगी ही नरक है । लोगों की सहानुभूति कंची के साथ है ।
"देखना ,अब भी वही कंची पिट रही होगी ।"---कोई अनुमान लगा रहा था । जिसका उत्तर तुरन्त ही आया---
"तो भैया तुम मोहल्ले में रहते भी हो या नही । अब वो दिन नही रहे । गट्टू और मंगल के होते किस्सू की इतनी हिम्मत नही है कि कंची पर हाथ उठा जाए...।"
गट्टू और मंगल मोहल्ले के दादा हैं । कई काण्ड करके जेल जा चुके हैं । ठाकुर रायसिंह के मकान में एक कमरा किराए से उन्होंने ही किस्सू को दिलवाया है । गट्टू ने कंची को बहन माना है । और मंगल ने भौजाई । अब उनकी बहन--भावज को कोई टेढी नजर से भी देख तो जाए । किस्सू की क्या शामत आई है ।
तब तो सचमुच किस्सू की शामत ही आई थी । वह कंची को पीट रहा था । दरअसल वह गुड्डन के बारे में पूछ रहा था कि वह रोज जाती कहाँ है । उससे बिना पूछे-बताए लडकी को कौनसे काम पर लगा दिया है जो लौटने में रोज दस--ग्यारह बज जाते हैं । और उसके पास ये नए-नए कपडे ,सैंडिल, कहाँ से आए ।
"यह सब तो वह पूछे जो कमा कर खिलाए"---कंची ने जो यह जबाब दिया तो किसनलाल तिलमिला उठा ।बस दो हाथ जमाए ही थे कि कंची की चीख गट्टू और मंगल के कानों तक पहुँच ही गई । दोनों तुरन्त आगए । आते ही गालियों की बौछार करते हुए किस्सू पर पिल पडे । और लगा कि मोहल्ले में बलवा होगया ।
किस्सू जमीन पर अधलेटा पडा रिरिया रहा था---"मंगल भैया ,गट्टू भैया मेरी बात तो सुनलो ..।"
"क्या सुनें तेरी हरामखोर.!"----मंगल पूरी ताकत से चिल्लाया ।--- "साला दो घूँट पीकर आए दिन नौटंकी करता रहता है । बीबी--बच्चों का खयाल नही है । दो लात पडेंगी तभी सही होगा । अब वो जमाना नही रहा कि मर्द औरत को जानवर की तरह पीटता रहे और लोग चुपचाप तमाशा देखते रहें । खास तौर पर मैं तो टाँग तोड कर हाथ में पकडा दूँगा समझे ।"
"मेरी बात सुनलो मंगल भैया फिर जो सजा दोगे मंजूर है '---किसुनलाल लडखडाते हुए मंगत के पैरों में गिर गया । शराबी की हेकडी तभी तक कायम रहती है जब तक कोई धमकाता नही । एक घुडकी उसे जमीन पर ले आती है
मंगल भैया , मेरी बेटी..मेरी गुड्डन अभी तक नही लौटी है । 'राँड' बताती नही है कि लडकी कहाँ गई है । फिर पीटूँ नही तो क्या पूजा करूँ इसकी !"
पहले ,चल दूर हट---मंगत ने पाँव झटका--- बडा आया लडकी की चिन्ता करने वाला ... चुपचाप जाकर अन्दर सो जा । वरना दो लपाडे धर दूँगा तो आँखें बाहर निकल आएंगी कौडियों की तरह..।
एक तो कुछ कमाता धमाता नही है और घरवाली को आए दिन पीटता रहता है । साले की रिपोट लिखादी तो जाएगा महीनों के लिये जेल में ...।
"अर् र् रे ऐसे कैसे कर दोगे रिपोट ! लडकी के मामा चाचा बने फिरते हो और....। मेरे क्या जबान नही है । मैं भी सब बता दूँगा कि मेरी लडकी को कौन बरगला रहा है । मुझे सब पता है । किस् सी से डरता नही हूँ "---किस्सू ने सीना तान कर खडे होने की कोशिश की । फिर लडखडा कर गिर पडा ।
अरे यह ऐसे नही मानेगा---मंगत और गट्टू ने उसे पकड -घसीट कर कमरे में बन्द कर दिया ।
कमरे में से बर्तनों के पटकने--फोडने की आवाज किस्सू की नशे में लडखडाती चीखें सुनाई देरही थी ---"अर् रे ,कोई तो सुन लेता मेरी बात । अरे 'अधरमियो' ! कीडे पडेंगे तुम्हारे । दगाबाजो ..!"
"चलो..चलो ..स्साला , पियक्कड है । पियक्कडों की बात का क्या भरोसा । रात भर ऐसे ही नाटक करेगा ,सुबह सही होजाएगा ।"---मंगल ने कहते हुए सबको धकेला और नाटक का पटाक्षेप कर दिया ।

Friday, November 25, 2011

छोटी सी बात




26 नवम्बर 2011
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समय के द्रुतगामी रथ पर सवार जिन्दगी कब कितने पडाव पार कर जाती है पता ही नही चलता । पर लगता है कि माँ के लिये समय ठहर जाता है । देखिये न ,आज प्रशान्त (बडा बेटा) तेतीस वर्ष पूरे कर चुका है ।पर मेरे लिये आज भी वैसा ही है जैसा बचपन में था । इस बार कुछ नया नही लिखा । इसलिये दो कहानियाँ पोस्ट कर रही हूँ ।एक यहाँ ''छोटी सी बात'' । और दूसरी--"पहली रचना" कथा-कहानी ब्लाग पर । पन्द्रह-बीस साल पहले लिखी गईं ये दोनों कहानियाँ पूरी तरह तो नही पर अधिकांशतः प्रशान्त (गुल्लू) पर ही केन्द्रित हैं । आप कृपया दोनों कहानियाँ पढें । हालाँकि ये दोनों ही कहानियाँ प्रकाशित हो चुकीं हैं लेकिन आप सबके पढने पर अधिक सार्थक होंगी ।
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"मम्मी !... मम्मी मेरी बात सुनो न ।"--गुल्लू ने मुझे फिर पुकारा ।
यह उसकी आदत है । चाहे कोई काम हो या न हो वह जब तब मुझे पुकारता रहता है--"मम्मी कहाँ हो मम्मी मेरी बात सुनो ..जरा यहाँ आओ न मम्मी । पढते समय भी बीच-बीच में भी वह मानो आस्वस्त होनेके लिये ही कि मैं घर में ही हूँ मुझे पुकार लेता है तभी निश्चिन्त होकर पढता है । अगर उसे लगता है कि मैं घर में नही हूँ तो पढाई छोड मुझे तलाशना शुरु कर देता है । किचन बाथरूम छत पडोस और जहाँ भी मेरी संभावना होती है तलाश करता है ।यहाँ तक कि लैट्रिन के दरवाजे पर जाकर भी एक--दो आवाजें लगा ही देता है ।
"यह भी कोई तरीका है ।" मैं उसे डाँटती हूँ । उसकी इस आदत से मुझ पर एक अनावश्यक सा बन्धन तो रहता ही है उसकी बात का महत्त्व भी कम होता है ।हाल यह कि वह पुकारता रहता है और मैं उसे अनसुना कर अपने काम में लगी रहती हूँ । उस समय भी जब वह मुझे जल्दी आने की रट लगाए था मैं रसोई में काम निपटाने में लगी थी ।
इस बात को आगे बढाने से पहले मैं वे बातें जरूर बताना चाहूँगी जिनके कारण मुझे उसके प्रति काफी असंवेदनशील होना पडा है । वह छुटपन से ही मनमौजी रहा है । मुझे याद है कि उसे दूध पीना जरा भी पसन्द नही था । निपल से तो बिल्कुल नही । चम्मच से पिलाना एक बडा और मुश्किल अभियान हुआ करता था ।पहले तो वह मुँह ही नही खोलता था । होठों को कस कर बन्द कर लेता था । जैसे तैसे करके दूध मुँह में डाल भी दिया जाता तो वह झटके से गर्दन मोड कर सारा दूध बाहर निकाल देता था । जब तक वह दूसरी चीजें खाने लायक नही हुआ अक्सर भूखा रहता था इसलिये कमजोर व चिडचिडा भी । पर जब सब कुछ खाने लगा तब भी उसके नखरे कम नही थे । एक चीज को वह दिन में सिर्फ एक बार ही खाता था । जैसे कि एक बार दाल-चावल खा लिये तो दूसरी बार कुछ और ही खाना होता था ।
वह अक्सर रूठ जाया करता था और उसे मनाने के लिये भी हर बार नया तरीका अपनाना होता था । जैसे एक बार कहानी सुनादी तो दूसरी बार कोई चित्र या खिलौना देना पडता था । फिर गीत या कविता ऐसे ही फिर कोई और तरीका...। चूँकि गुल्लू घर का पहला छोटा बच्चा था । खूबसूरत और प्यारा भी इसलिये घर का हर सदस्य उसके नाज़ उठाने तैयार रहता था । पर कभी--कभी सबका दिमाग जबाब देजाता था । एक बार ऐसा ही हुआ कि गुल्लू किसी बात पर रूठ गया । और ऐसा रूठा कि मनाने के सारे उपाय बेकार साबित हुए । मैंने तंग आकर दो-तीन तमाचे जड दिये । बस यह तो आग में मिट्टी का तेल डालना होगया । वह जोर से चीखने लगा और मैं खीज व ग्लानि-बोध से भरी निरुपाय सी उसे रोता हुआ देखती रही तभी उसके पापा आगे आए ।
हटो सब लोग--उन्होंने अपना रंग जमाने की कोशिश करते हुए कहा --"हमारे गुल्लू से बात करने की किसी को तमीज ही नही है ।" लेकिन उनकी इस बात का उस पर कोई अच्छा असर नही हुआ बल्कि वह और भी कोने में खिसक गया और रो रोकर आँख--नाक एक करता रहा ।
"भैया ,एक बार की बात है "---अचानक उसके पापा सबको चौंकाते हुए नाटकीय अन्दाज में बोले----"सब ध्यान से सुनना-टिल्लू ,पिल्लू, चीकू,मीकू, ..और हाँ बीना तुम भी..।" उन्होंने गुल्लू का नाम छोड कर हम सबका नाम लिया और रहस्यमय तरीके से सुनाने लगे---"हाँ तो भैया ..एक बार हम एक सुनसान जंगल से गुजर रहे थे । वह ऊँटों से भरा जंगल था । अचानक एक ऊँट चिघाडता हुआ हमारी ओर आया । "...
इतना कह कर वे कुछ रुके क्योंकि 'चिघाडता' शब्द सुनकर गुल्लू ने अचानक पलट कर ऐसे देखा मानो उसके पापा ने कोई गलत बात कह दी हो । पर तुरन्त ही उसने पहले की तरह मुँह फेर लिया । तब वे आगे सुनाने लगे----"हाँ तो भैया वह ऊँट हमारी ओर दौडा ..। उसके सूप जैसे कान थे । खम्बे जैसे पैर और एक लम्बी जमीन को छूती हुई सूँड...उस ऊँट को देखकर..."
"वह तो हाथी था ।"---गुल्लू अचानक चिल्लाया । हमने अपनी हँसी को जैसे-तैसे दबाए रखा । उसके पापा चहककर बोले---"देखा ,मैंने कहा था न कि हमसे ज्यादा नालेज हमारे गुल्लू को है । हाँ तो बेटा फिर ऊँट कैसा होता है ?"
"ऊँट की टाँगें तो लम्बी और पतली होतीं हैं ,टेढी-मेढी भी । पीठ पर बडा सा कूबड होता है । गर्दन खूब लम्बी होती है ।मुँह बैल जैसा और होठ लटके से रहते हैं यों "..उसने होंठ लटका कर दिखाए । और फिर हिलते हुए बताया कि ऊँट ऐसे चलता है । अब गुल्लू जिस तरह किलक-किलक कर बात कर रहा था कौन कह सकता था कि बच्चा रोता भी है ।
ऐसा ही एक और मजेदार वाकया हुआ । हम गुल्लू को मेला दिखाने लेगए । मेले में घूमते हुए गुल्लू बहुत खुश था । उसने अपनी कई मनपसन्द चीजें खरीदवाईं । आइसक्रीम खाई । नाव में झूले । अप्पूघर और डिज़नीलैंड की सैर की ।गुब्बारों पर निशाने लगाए और भी बहुत कुछ...।
पर शाम को जैसे ही लौटने लगे वह मचल गया ।
"आपने मेला तो दिखाया नही ।"
"मेला ?.. अरे बेटा दिन भर हम मेला ही तो देखते रहे ,जहाँ तुमने खिलौने खरीदे ,आइसक्रीम खाई ...।"
"वे तो दुकानें थीं । मुझे तो मेला देखना है ।"
मेरी अक्ल तो ऐसे मौकों पर टका सा जबाब दे जाती है । उसके पापा ही सोचते रहे कि कैसे अपने अक्लमन्द लाडले को मेले की परिभाषा समझाएं । कुछ सोच कर वे उसे ओवरब्रिज पर लेगए । वहाँ से पूरा मेला दिखरहा था । शाम के धुँधलके में रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता हुआ मेले का विहंगम दृश्य।
"देखो बेटा मेला वो है । है न खूबसूरत !"
और तब गुल्लू महाशय सन्तुष्ट हुए ।
गुल्लू अक्सर ऐसे काम करता जो मेरी समझ से बाहर होते हैं । एक दिन मैंने देखा कि वह अकेला एकटक दीवार को देखे जा रहा था । जब मैंने टोका तो बडा उत्तेजित होकर बोला --"मम्मी ! क्या आपने कभी चींटियों को गौर से देखा है ?"
"चींटियों को ??"--मेरा दिमाग भन्ना गया --"लडका है कि अजूबा ! पढने में जरा दिमाग नही लगाता ।" मैंने उसे झिडकते हुए कहा ---"मेरे पास इन बेसिरपैर की बातों के लिये वक्त नही है । चलो बस्ता उठाओ और स्कूल का काम करो ।"
बस हमेशा काम काम--वह पैर पटकता हुआ बडबडाता रहा---"मेरी बात तो कभी ध्यान से सुनती ही नही । मेरे लिये किसी को फुरसत ही नही है ।"
इसकी बातें जब नही सुनी जाएंगी तभी यह आदत छूटेगी हर वक्त कुछ न कुछ फालतू करते रहने की । मैंने सोचा था । पर मेरा सोचा क्या पूरा हुआ । मैं सुनूँ या न सुनूँ उसे मुझे पुकारना ही है ।
मैंने अपनी बात यही छोडी थी कि तब भी मैं रसोईघर में अपना काम निपटा रही थी और गुल्लू मुझे पुकारे जारहा था---"मम्मी ! सुनो ना ...बस एक मिनट के लिये बाहर तो आओ । मम्मी..!"
"मुझे इस समय तंग मत कर गुल्लू । दूध गरम हो रहा है । मुझे ऑफिस भी जाना है ।"---मैंने तीखे और निर्णायक स्वर में कहा । मेरे मन में कही यह भय भी था कि यह जरा सा बच्चा जब अभी से मुझे अपने इशारों पर चला रहा है । यहाँ आओ ..वहाँ मत जाओ ..यह करो .वह मत करो ..यह सुनो वह सुनाओ .--हद होगई ।"-- इसलिये वह बुलाता रहा ,मैं नही गई । इससे मुझे एक सन्तुष्टि मिली ।
थोडी देर बाद जब मेरा काम पूरा होगया मैं उसे देखने गई । उसका यों चुप होजाना भी असहज लग रहा था । वह दोनों हाथों से घुटनों को बाँधे सीढियों पर अकेला बैठा था । उसकी गर्दन तनी हुई थी मोर की तरह । उसने मुझे देखा तक नही । बल्कि मुझे देख कर मुँह फुला लिया । होठों के किनारों से बुलबुले फूट रहे थे । गोरा चेहरा सुर्ख होगया था और आँखें पनीली । मुझे कुछ खेद हुआ । उसके पास बैठ कर उसके बालों में हाथ फेरते हुए पूछा---
"अब बता बेटा । क्या कह रहा था । क्यों बुला रहा था मुझे ?"
उसने मेरी बात जबाब नही दिया और मेरा हाथ झटक दिया ।
"अब मैं आगई हूँ न !"--मैंने उसे मनाते हुए कहा तो वह चिल्ला कर बोला---अब आने से क्या होता है । इतनी देर से बुला रहा था तब तो आई नही । यह कहते कहते उसकी आवाज भर्रा गई । गले की नसें फूल गईं होंठ काँप रहे थे और आँखें ,लगता था कि अभी निकल पडेंगी । मुझे लगा कि मझसे बडी भूल होगई है । मैंने उसे कन्धे से लगाया और पीठ सहलाते हुए यह जानने की कोशिश करने लगी कि वह क्या कहना चाहता था । कुछ देर बाद जब वह कुछ सहज हुआ तो बोला ---"पता है ,अमरूद के पेड पर एक बहुत सुन्दर चिडिया बैठी थी । मम्मी तुम देखतीं तो खुश होजातीं।"
चिडिया..। मुझे धक्का सा लगा । एक चिडिया के पीछे इतना हंगामा । पर मैं अब उसे नाराज नही करना चाहती थी इसलिये बोली---"मुझे क्या मालूम था कि तू इतनी सुन्दर चिडिया दिखाने वाला है । अच्छा कहाँ है वह ?"
"अब क्या हमारे लिये बैठी ही रहेगी !" ---वह कुछ ताव में बोला पर जल्दी ही दूसरी बातों में खोगया कि "मम्मी मिट्ठू है न वह जब गुस्सा होता है तो पत्तों को नोंच-नोंच कर गिराता है । और कौए हैं न कपडों से अपने दुश्मन की पहचान करते हैं । पता है मिंकू ने कौए का घोंसला गिरा दिया तो कौए मिंकू के पीछे तो पडे ही रहते हैं एक दिन उसके भाई ने मिंकू की शर्ट पहन ली तो कौए उसके पीछे भी पडगए । कितने बुद्धिमान होते हैं न पक्षी !"
हम बडों को तो इन बातों का पता ही नही रहता । बच्चों की अनुभूति कितनी गहरी व सूक्ष्म होती है ।---मैं यही सोचती हुई उस चिडिया को तलाशने लगी ।
"देखो ,गुल्लू कही वह तो नही है तुम्हारी वाली चिडिया ?" मैंने अनार की टहनियों में फुदकती हुई एक सुन्दर व चंचल चिडिया को देख कर पूछा ।
"हाँ..हाँ मम्मी ! वही तो है "---गुल्लू एकदम चीख कर बोला---"देखो न कितनी सुन्दर है ! चोंच कितनी नुकीली है ! और आँखें कितनी बडी और काली ! देखो पूँछ कैसे मटका रही है नटखट कहीं की ।"
वह चिडिया को देख मुग्ध हुआ जारहा था । पर मैं उसे देख रही थी उसकी आँखों को ,जिनसे खुशी झरने की तरह फूट चली थी । खुशी एक छोटी सी चिडिया को देख पाने की । और उससे भी ज्यादा मुझे दिखा पाने की खुशी । अपनी खुशी को मेरे साथ बाँट पाने की खुशी । इन छोटी-छोटी बातों में इतनी बडी खुशियाँ छुपी होतीं हैं मैंने तो सोचा भी नही था ।
"मम्मी ! यह चिडिया है न बहुत खबसूरत ?" उसने किलक कर पूछा तो मैं कहे बिना न रह सकी कि," हाँ सचमुच इतनी खूबसूरत चिडिया मैंने पहली बार देखी है ।"

Saturday, November 12, 2011

मान्या मेरी टीचर






14 नवम्बर--2011

हमारी मान्या जी आज पूरे पाँच साल की होगईँ हैं । मजे की बात यह कि समझ में वे इससे ज्यादा बडी हो चुकीं है । सुलक्षणा ने एक दिन उसे बता दिया कि दादी भी टीचर हैं । उसका उद्देश्य निश्चित ही यह रहा होगा कि टीचर के नाम से मान्या जी कुछ 'डिसिप्लेन्ड' रहें जिसकी जरूरत माँओं को कुछ ज्यादा रहती है (दादी नानी की अपेक्षा ) पर अपनी तो आफत ही आगई ।
देखिये कि वे अब मेरी कैसी-कैसी परीक्षाएं लेतीं हैं ।
"दादी आपको सिन्ड्रेला की स्टोरी तो आती होगी । आप तो टीचर हैं ?"
"दादी मम्मी से कहो कि मुझे भी मार्केट ले जाएं । आपकी बात तो मान लेंगीं ।...क्यों ? क्यों नही मानेंगी ? आप तो टीचर हैं न !"
"दादी ! आप टीचर हैं तब आप को तो पता होगा कि मम्मी ने मेरी सारी चाकलेट्स कहाँ रखदी हैं ।"
"अरे दादी , आप मम्मी से क्यों पूछ रही हैं कि पिज्जा कैसे बनता है । आपको तो सब आता है । आप तो टीचर हैं न !"
"दादी ! मेरी खिलौने वाली बकेट उतार दो न । पापा आपसे कुछ नही कहेंगे आप तो टीचर हैं न ?"
"ओ हो दादी ! टीचर होकर भी आपको नही पता कि कार्टून नेटवर्क कहाँ आता है ।"
"अरे दादी !आपको क्यों नही पता कि मेरी बेस्ट फ्रेंड का नाम क्या है । टीचर को तो सब पता होता है । है न ?"
दादी आप आज मम्मी को कहदो ऑफिस नही जाएं .आपकी बात तो मानेंगी । आप तो टीचर हैं न ।
तो टीचर यानी एक सर्वज्ञाता, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हस्ती । होगई न अपनी आफत ।


और अब,
मान्या की टिप्पणी
यहाँ कविता के रूप में ।
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बडी भुलक्कड मेरी दादी ।
वैसे तो हैं सीधी--सादी
जैसे हो बापू की खादी
पर अक्खड लगती हैं दादी ।
बडी भुलक्कड मेरी दादी ।


कहते-कहते बात भूलती
चलते-चलते राह भूलती
दवा समय पर कभी न लेतीं
गैस चढा कर चाय भूलतीं


चश्मा--चाबी अक्सर भूलें
सबसे फिर ढुँढवातीं हैं

पेन हाथ में लिये-लिये ही
पेन कहाँ है चिल्लाती है ।


मन्नू को छुन्नू कह देतीं
छुन्नू को कहतीं हैं गुल्लू ।
मम्मी को बेटा कहती हैं
दादी बन जातीं हैं उल्लू ।

Wednesday, November 9, 2011

एक नदी

मुझे क्या पता कि
किधर है ढाल
और किस बनावट की
यह धरती है
मैं तो इतना ही जानती हूँ कि
एक नदी है जो
सिर्फ तुम्हारी ओर
बहती है ।
किनारों को छूती हुई
एक सदानीरा नदी ।
ढाल बदला नही जा सकता
इसलिये नदी का प्रवाह भी
बदला नही जासकता ।
तुम भी मत कोशिश करो
उसे बदलने या रोकने की ।
रोकने से बाढ के हालात बनते हैं
बस्तियाँ डूबतीं हैं ।
सिमट जाती है जिन्दगी एक ही जगह
वर्षों तक पानी ,सीलन और सडन में
कुलबुलाते है कीडे--मकोडे ।
नदी को बहने दो ।
बहेगी तो साफ रहेगी
धरती को सींचेगी ।
बुनेगी हरियाली के कालीन
नदी को मत रोको हठात् ही
उसे बहने दो ।
सृजन की कथाएं कहने दो ।
हो सके तो तुम भी बहो
इस नदी के साथ
नही तो किनारों के साथ
चलो जहाँ तक चल सको ।
नदी तुम्हें भी सिखा देगी
बहना , उछलना , मचलना
और निरन्तर सींचना धरती को ।

Thursday, October 27, 2011

कही छूट जाना एक 'चकरी ' का

इस बार मैं दीपावली पर बैंगलोर न जा सकी । बच्चों के बिना त्यौहार फीका न लगे इस विचार से मयंक(छोटा बेटा) ही यहाँ आगया ।
मयंक में बचपन से ही छोटी-छोटी चीजों को भी जितने विस्तार संवेदना व गहराई से देखने की क्षमता है, मुझमें आज तक भी नही है। आज वह बहुत सारे पटाखे, फुलझडियाँ ,अनार और चकरियाँ खरीद लाया । चकरी उसे खास तौर पर पसन्द है । जब बेशुमार किरणों के साथ वह पूरे आँगन में चक्कर लगाती हुई घूमती है तो लगता है जैसे यह विष्णु भगवान का चक्र है जो अँधेरे को काट रहा है । या अँधेरे की नदी में बेहद चमकीला भँवर है जो धारा को अवरुद्ध कर फैलता जा रहा है या आसमान से बिछडा कोई सितारा है जो जमीन पर गिर कर चकरा रहा है । या फिर कोई तारा मछली भटक कर समुद्र से निकल धरती पर आगई है और जल बिन अकुला रही है ।
बाजार से आते ही उसने बैग से निकाल-निकाल कर मुझे सारी चीजें दिखाईं । तेज धमाके वाले कई बम ,कई तरह की फुलझडियाँ ,अनार ,रेल और ...चकरियाँ..
"अरे !चकरियों वाला डिब्बा कहाँ है माँ ? पूरा डिब्बा था । काफी बडी चकरियाँ लाया इस बार जो देर तक घूमतीं हैं ।"
"अच्छा ! लेकिन बेटा भला मैं कैसे जान सकती हूँ ! लाकर तो तूने ही रखा है । ठीक से देख । होगा यहीं कहीं । जाएगा कहाँ!"
मैं पूजा सजाने में व्यस्त थी लेकिन वह यहाँ वहाँ ढूँढने लगा तो मैं भी उसके साथ देखने लगी और कुछ चिन्तित भी हुई । न केवल उसकी खुशी का खयाल करके बल्कि पैसों के व्यर्थ चले के कारण भी । लेकिन मुझे देख कर वह झट से बोला --"छोडो माँ , जाने दो ।"
रात को सोने से पहले वह काफी संजीदा था । मेरे पूछने पर कहीं डूबती हुई सी आवाज में बोला--" माँ आजकितनी आसानी से कह दिया कि जाने दो उन चकरियों के लिये जिन्हें हम कभी एक-एक रुपया जोड कर खरीदते थे । कितने चाव से पटाखे -फुलझडियाँ लाते थे और एक-एक चीज को एक-एक चीज को कैसे गिन-सहेज कर रखते थे ! एक भी फुलझडी या चकरी कम होजाने पर जैसे सारा गणित ही गडबडा जाता था हमारा ।"
"अब इतना सोचने की क्या बात है बेटा ! यह तो समय-समय की बात है । आज इतनी गुंजाइश है कि चीजों के खोने पर चिन्ता न करनी पडे ।"-मैंने कहा ।
"यही तो माँ !"-- वह कहीं खोया हुआ सा कहने लगा---कहाँ तो एक चकरी का कम होना ही अखर जाता था कहाँ अब पूरा डिब्बा खोने का भी कोई मलाल नही । यह बेशक हमारी आर्थिक उन्नति का सूचक है । पर प्रतीकात्मक रूप से ये -"छोडो, जाने दो" जैसी तसल्लियाँ क्या उस संवेदन-शून्यता को नहीं दर्शातीं जिसके चलते किसी भी भावनात्मक क्षति को अब सहजता व हल्केपन से लिया जाना एक जरूरत बन रहा है । उस एक चकरी से मिली खुशी को हम अब किसी कीमत पर खरीद नही सकते यही नही हम उसके प्रति लापरवाह हो भी चले हैं जो हमारे जीवन को सरस व समृद्ध बनाती है और माँ यह तो बताने की बात नही है न कि समृद्धि केवल पैसा आजाना नही है ।"
मयंक की बातें मुझे आश्वस्त तो करतीं हैं पर कहीं चिन्तित भी । पता नही क्यों।

Tuesday, October 25, 2011

चकमक और मैं


आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।
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22 अक्टूबर को चकमक के तीन सौ वें अंक का विमोचन भारत-भवन( भोपाल) में श्री गुलजा़र जी द्वारा किया गया । इस अवसर पर उनके अलावा और भी अनेक प्रख्यात साहित्यकार थे । एक तरह से चकमक से जुडे सभी लोगों के लिये यह काफी महत्त्वपूर्ण अवसर था । मेरे लिये भी ।


सन् 1986 में चकमक से मेरा परिचय अँधेरे कमरे में टार्च हाथ लग जाने जैसा हुआ था । उन दिनों में उसी गाँव के उसी स्कूल में पढाया करती थी जहाँ कुछ साल पहले मैं खुद पढी थी । मुख्य सडक से काफी दूर हमारा गाँव तब हर सुविधा से वंचित था आठवीं व ग्यारहवीं कक्षा तो सात-आठ कि. मी.पैदल जा जाकर पास करलीं थी और बी. एम.ए. के प्रमाण-पत्र बच्चों को पालते-सम्हालते हुए स्वाध्याय द्वारा हासिल कर लिये थे ।मतलब कि बाहर की दुनिया से कोई खास परिचय नही था । खास तौर पर पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य से ।(आज भी मैं कूप-मण्डूक ही हूँ) जो कुछ भी पाठ्यक्रम में आया ,ज्ञान वहीं तक सीमित रहा । यों लिखने का शौक तो ग्यरहवीं कक्षा से ही शुरु होगया था । और सात-आठ कहानियाँ व कविताएं व गीत तभी लिख डाले थे । यही नही एक बाल उपन्यास भी लिख डाला जिसका एकमात्र पाठक मेरा छोटा भाई ही रहा । खैर वह उपन्यास व कहानियाँ तो नष्ट हो गईँ पर कविताएं अभी भी हैं लगभग दो सौ गीत ---जाने कौन जिन्दगी में यह नव-परिवर्तन लाया ..या मैं तुमको पहचान न पाई ..आदि । पर वे सब अप्रकाशित रचनाएं आत्म-केन्द्रित सी हैं और उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने का दुस्साहस नही करूँगी ।
चकमक का आना एक नयी राह मिलने जैसा था । हालाँकि उसके बाद मैंने कोई सृजन के कीर्तिमान नही बनाए फिर भी पहली बार हुई हर घटना अविस्मरणीय होती ही है । यह चकमक ही है जिसमें पहली बार मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई । वह रचना एक कविता थी--मेरी शाला चिडिया घर है ..। इस कविता के प्रकाशन विषयक एक रोचक प्रसंग है जिसे फिर कभी लिखूँगी । हाँ इसके बाद चकमक का हर अंक मेरे लिये कुछ न कुछ लाता रहा और मुझसे खींच कर रचनाएं भी लेजाता रहा । एक शिक्षिका होने के नाते चकमक से मैंने बहुत कुछ सीखा । बहुत अधिक तो नही पर अब तक चकमक में मेरी लगभग पचास रचनाएं आ चुकीं हैं । मैं मानती हूँ कि अगर चकमक से न जुडी होती तो शायद ये रचनाएं भी न बन पातीं । इस अर्थ में अच्छी पत्रिकाओं से वंचित रहना एक बडी हानि है पाठक व लेखक दोनों की ।
कलेवर की दृष्टि से चकमक अब सचमुच चकमक होगई है । शानदार रंगीन पृष्ठ ,चित्र आकर्षक आवरण और प्रख्यात देशी-विदेशी रचनाकारों की रचनाएं । सम्पादक भाई सुशील शुक्ल अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग करते प्रतीत होते हैं । मैं जब चकमक से जुडी थी तब चकमक के सम्पादक श्री राजेश उत्साही थे । उस समय क्योंकि पत्रिका का आरम्भकाल था सो भले ही इतना बाह्याकर्षण नही था लेकिन सामग्री का स्तर किसी भी स्तर पर कम नहीं था । खैर ,यहाँ उस पहली रचना को पुनः दे रही हूँ ---

"मेरी शाला है चिडिया-घर ।
हँसते खिलते प्यारे बच्चे ,
लगते हैं कितने सुन्दर ...।
(1)फुदक-फुदक गौरैया से ,
कुर्सी तक बार-बार आते ।
कुछ ना कुछ बतियाते रहते,
हरदम शोर मचाते ।
धमकाती ,---डर जाते ,
हँसती,------ तो हँसते हैं,
मुँह बिचका कर .। मेरी शाला .....
(2)तोतों सा मुँह चलता रहता,
गिलहरियों से चंचल हैं ।
कुछ भालू से रूखे मैले ,
कुछ खरहा से कोमल हैं ।
दिन भर खाते उछल-कूदते ,
मानो वे हैं नटखट बन्दर ।
मेरी शाला ........
(3)हिरण बने चौकडियाँ भरते ,
ऊधम करते जरा न थकते ।
सबक याद करते मुश्किल से ,
बात-बात पर लडते --मनते ।
पंख लगा उडते से लगते ,
आसमान में सोन -कबूतर ।
मेरी शाला.....।
(4)पल्लू पकड खींच ले जाते ,
मुझको उल्टा पाठ पढाते ।
बत्ती खोई...धक्का मारा ...,
शिकायतों में ही उलझाते ।
और नचाते रहते मुझको ,
रखना काबू कठिन सभी पर ।
मेरी शाला ....।
(5)पथ में कहीं दीख जाती हूँ ,
पहले तो गायब हो जाते ,
कहीं ओट से दीदी--दीदी----
चिल्लाते हैं ,फिर छुप जाते ।
कान पकड लाती हूँ तो ,
अपराधी से होजाते नतसिर ।
मेरी शाला .....
(6)जरा प्यार से समझाती हूँ ,
तो बुजुर्ग से हामी भरते ।
पर वे ऐसे मनमौजी ,
अगले पल अपने पथ पर चलते ।
बातें मेरी भी सुनते हैं ,
पर लगवाते कितने चक्कर ।
मेरी शाला ....
(7)गोरे ,काले ,मोटे पतले ,
लम्बे ,नाटे ,मैले ,उजले ।
कोमल ,रूखे ,सीधे ,चंचल,
अनगढ पत्थर से भी कितने ।
पर जितने ,जैसे भी हैं ,
मुझको लगते प्राणों से बढकर ।
मेरी शाला है चिडियाघर ।
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Wednesday, September 28, 2011

हम संझा साँझी खेलते

क्वार माह यानी शरद ऋतु का प्रारम्भ । यानी एक रमणीय और सुहानी ऋतु का आगमन । इस ऋतु के सुहानेपन को कवि-शरोमणि तुलसीदास जी ने अनेक अनूठी उक्तियों द्वारा व्यक्त किया है ।
कवि सेनापति ने शरद-वर्णन जिस सजीवता से किया है, दर्शनीय है---
"पावस निकास याते पायौ अवकास ,भयौ जोन्ह कौ प्रकास सोभा ससि रमनीय कौं । विमल आकास होत वारिज विकास ,
सेनापति फूले कास हित हंसन के जीय कों । छिति न गरद,मानो रंगे हैं हरद सालि, 
सोहत जरद को मिलावै प्रान पीय कौं ।
 मत्त हैं दुरद मिट्यौ खंजन दरद ,
रितु आई है सरद सुखदाई सब जीव कौं ।"
ऐसी सुखदाई ऋतु में जब वर्षा रानी की छमछम ठहर जाती है, बिजली की सुनहरी पायलें उतार दी जातीं हैं ,बादलों के नगाडे उठा कर रख दिये जाते हैं ,किसी धुले-पुछे दर्पण जैसे निरभ्र आसमान की नीलिमा गहरा जाती है ,चाँदनी निखर कर चमक उठती है , ताजा नहाई सी धरती हरी चूनर ओढ कर मुस्करा उठती है, कास फूल उठता है , नदियाँ पारदर्शी हो जातीं हैं , तब तारों की छाँव में किशोरियों की तानें गूँज उठतीं हैं --"हम संझा साँझी खेलते ,हम जाहि बिरियाँ तन खेलते...
म्हारे उतते ही आए बाबुला ,बाबुल ने लई पहचानि .संझा साँझी..."
फूलों के रूप और गन्ध से गमकता ,लोक कला के सौन्दर्य से दमकता यह उत्सव गँवई--किशोरियों का सबसे उल्लासमय त्यौहार होता है । कनागतों (श्राद्ध-पक्ष) के साथ शुरु हुआ यह उत्सव सर्व-पितृ अमावस्या तक चलता है । मुझे याद है कि किस तरह हमारी हर शाम गीतों से गूँजती थी । पन्द्रह दिन हँसते-गाते बीत जाते थे एक नई ऊर्जा व उल्लास देकर ।
त्यौहार ऊर्जा व उल्लास तो देते ही है पर साथ ही हमें लगता है कि समय सिकुड कर छोटा होगया है धोने पर सिकुडे सूती कपडे की तरह । सावन बीता कि जन्माष्टमी आई । फिर साँझी ,नौदेवी ,दशहरा, दिवाली फिर देवठान....त्यौहार किस तरह जिन्दगी को गति देते हैं कि दौड उठती है फास्ट ट्रेन की तरह । दिन महीने पेडों की तरह पीछे भागते लगते हैं ,इस तरह कि उन्हें गिन भी नही पाते ।
हाँ अभी बात है केवल साँझी की .
क्वार में प्रतिपदा को प्रतीक्षा का उल्लासमय अन्त एक लुभावनी सी प्रतिस्पर्धा के आरम्भ के रूप में हो जाता था । प्रतिस्पर्धा यह कि एकदिन पहले पूर्णिमा  के दिन ही तय होजाता था कि इस साल साँझी किसके द्वार की दीवार पर सजेगी ,कि कौन सबसे ज्यादा सुन्दर और रंग-बिरंगे फूल लाएगी और कौनसे दिन किसके घर से साँझी का भोग लगेगा । 
साँझी के लिये सबसे पहला और सबसे प्यारा व रोचक काम होता था फूल इकट्ठे करना . धरती पर साँझ के उतरते--उतरते फूलों का ढेर लग जाता था -लाल, पीले, नीले गुलाबी, सफेद, जोगिया ..तमाम रंग के बेशुमार फूल जो खेतों, बाडों और बगीचों से चुन कर लाए जाते हैं । उधर कुछ कला-चतुर किशोरियाँ दीवार को गोबर से लीप कर गोबर से ही सुन्दर आकृतियाँ बनातीं थी । वे आकृतियाँ अनेक तरह की होतीं थीं--चन्दा--तारे, सूरज,मोर ,गूजरी , पनिहारिन, वृक्ष ,फूल-पत्ती और साँतिये आदि विभिन्न तरह की रचनाएं जो फूलों से सज्जित होकर जगर-मगर खिल उठतीं  थीं । रचनाकाराएं खुद ही मुग्ध होकर गा उठतीं थीं---
"मेरी साँझुलदे के आसो-पासो फूलि रही फुलवारी ।
तुम पहरौ साँझुलदे रानी नौ तोले का हरवा ।
त्यारे बाबुल ने गढायौ ,मैया रानी ने दै घाल्यौ ..."
फिर दिया बाती की बेला पर जब मन्दिर में घंटा घड़ियाल के साथ भगवान की आरती होती थी इधर सभी लडकियाँ साँझुल रानी को भोग लगातीं थीं । भोग हर तरह का होता था- हलवा पूरी खीर लड्डू ,कच्चा दूध जो बडे 'जतन' से 'अछूता' रखा जाता था ,उसी तरह जिस तरह भगवान का भोग रखा जाता है । बड़ी श्रद्धा व भक्ति और उल्लास के साथ साँझी को भोग लगाया जाता था . लड़कियाँ गातीं भी जातीं थीं ---
"मेरी साँझी भोग ले, भोग ले ।
और की साँझी रोग ले रोग ले ।
 मेरी साँझी रानी और की साँझी..."
पता नही क्यों !'और' की साँझी के लिये की गई ऐसी अमंगल कामना ! यह मानवीय कमजोरी का सहज उद्घाटन है जिसके कारण वह अपनी वस्तु की श्रेष्ठता व कुशलता चाहता है । कोई छल नही ,कोई दुराव नहीं ।
भोग लगाने के बाद शुरु होता था गीतों का सिलसिला । गीत कई तरह के थे -चन्दा के ,भैया के , मायके की सहेलियों के और साँझी के सौन्दर्य के ।
किन्तु दूसरे लोकगीतों की तरह साँझी के गीतों में भी उस नारी की व्यथा-कथा के ही स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं जो माता-पिता की लाडली है । ससुराल में सास--ननद से प्रताडित है । वह मायके की गलियों के लिये तरसती है । चन्दा या बटोही द्वारा अपना मार्मिक सन्देश मायके को सन्देश भेजती है ----
"चन्दा रे तू चन्द बिरियां तन ठाड्यौ ही रहियो , 
हेला मारियो ही रहियो ।
सासु बोलनि मारै ,
ननदी ठोलनि मारै ।
मेरे बाहुल से कहियो ,
उन्हें हरवा गढावैं ,
उन्हें पाट पुरावें...। 
मोहि बेगि बुलावें...।"
शायद हरवा कंगन पाकर लालची सास--ननदें उनकी बेटी के प्रति सदय हो जावें ।
कभी कोई मायके से आया राहगीर उसे पहचान कर पूछ लेता है । गाँव की बेटी उसकी अपनी बेटी जैसी ही तो है--
"तुम काहे के दुख दूबरी ,और काहेनि मैलौ भेस ...?"--उत्तर मिलता है --
"हम सासु के दुख दूबरी और ननदी रे मैलौ भेस ।"
ऐसा सुना जाता है कि साँझी किसी जुलाहे की लाडली और रूपसी बेटी थी । उसे ससुराल में झाडू व पौंछा की तरह इस्तेमाल किया जाता था । वह दूसरों का अनाज कूटती फटकती थी । तब कही उसे दो रोटियाँ मिल पातीँ थी । 
साँझी की व्यथा जैसे हर लडकी की व्यथा है । पराए घर जाकर उसे जाने कैसा वातावरण मिलेगा । सो भविष्य की सोच छोडकर बचपन को भरपूर जीने की सलाह देती है---
"खेलि लै बिटिया खेलि लै तू माई बाबुल के राज ।"
तेरहवें दिन कोट (साँझी का बडा रूप ) बनाया जाता है । इसमें वे सारी चीजें बनाई जातीं हैं जो पिछले बारह दिनों में बनाई गईँ थीं । मुझे याद है कि कोट की तैयारियाँ बडे जोर-शोर से की जाती थी जिसे सजाने में हमारे ताऊजी पूरा सहयोग करते थे । अपने निर्देश में ही हमसे मिट्टी की कौडियाँ बनवाते थे । सफेद रंग से रँगी और बीच में काली लकीर से सजी  वे कौडियाँ एकदम असली लगतीं थीं । सुनहरी--रुपहली पन्नियों के मुकुट, झुमके ,हार ,कंगनों से साँझी को सजाते थे । कोट में 'मुड़फोरा' का बडा महत्त्व होता था । यह मिट्टी से ही बना होता था इसे बडी चतुराई व गोपनीयता के साथ कोट में कहीं इस तरह फिट किया जाता कि कोई जान न सके । जान भी ले तो हरगिज ले जा न सके । इसलिये लडकियाँ रात भर जाग कर मुड़फोरा की रखवाली करती थी । सुबह उसे सलामत पाकर गा उठतीं थी ---"ऐ, रे मुडफोरा बामन !
मेरी साँझुलदे रानी कौं हरवा क्यों नहि लायौ "
संभवतः मुडफोरा को साँझी का सुहाग माना जाता होगा । उसे चुराने की रीति वर के अपहरण से जुडी होगी । किसी भी त्यौहार के पीछे कोई एक कहानी नही होती । समय और स्थान के अनुसार उसमें अनेक कथा-किवदंतियाँ जुड जातीं हैं । कोई समय होगा जब दूल्हे को चुराकर बेटी ब्याहना गौरव तथा मान की बात समझा जाता होगा । वधू-अपहरण तो इतिहास की जानीमानी घटना है ही ।
अमावस्या की शाम को भारी मन से साँझी को दीवार से उतार कर नदी में सिरा दिया जाता था । शाम को गोठ (दावत) होती थीं ।
उन दिनों को याद कर महसूस होता है कि खुशी न तो सुविधा-साधनों की मोहताज होती है न ही सम्पन्नता की । हमने सुविधाएं जुटाते-जुटाते उस खुशी को कहीं खो दिया है जो जीवन की सबसे बडी उपलब्धि होती है । ये प्रकृति के आँगन में जीवन से जुडे ये गीत ,ये पर्व हालाँकि गाँवों तक ही सीमित रहे हैं या कि अब गाँवों में भी टी.वी. ने इन लोक-उत्सवों का कुहुक फीका कर दिया है पर इनमें छुपी मानव की जिजीविषा और संवेदना से हम ,चाहे कही भी रहें, आज भी अलग नही है ।

सन् 1990 में चकमक में प्रकाशित
चित्र भी चकमक से ही लिये गए हैं।

Wednesday, September 14, 2011

शहर में बरसात

उसके स्वागत में कहीं
मोर नाचा नहीं
पपीहे ने गाया नहीं
उसके आने का सन्देश
हवा ने भी दिया नही
उमंगित होकर
लहर-लहर कर
बस आसमान का.
छोटा सा टुकडा
धुँधला हुआ,
गहरा हुआ ।
गडगडाहट हुई ।
बिजली चमकी।
बूँदें टपकीं
सीमेन्ट ,और कंकरीट की छत पर
मुँडेर पर रखे गमलों में
कोलतार की सडकों पर ।
नालियाँ उमडी
गीला हुआ।
फिर वर्षा थमी
सडकें सूखीं
मकान सूखे ।
आसमान साफ होगया
अक्सर ऐसा ही हुआ ।
और एक दिन यूँहीं
वर्षा गुजर भी गई,
किसी रजिस्टर में
अपने हस्ताक्षर किये बिना ही
अपना नाम आखिर ,वह,
लिखती भी कहाँ ..!

Thursday, September 8, 2011

जन्म दिन पर मन्नू के लिये






सुबह-सुबह की पहली धूप
मुबारक़ हो ।
पार किये उनतीस अनूप
मुबारक़ हो ।
बाँहों में कोमल
विहान सा ही उजला
अपना यह प्यारा प्रतिरूप
मुबारक़ हो ।

9 सितम्बर

Saturday, September 3, 2011

पुत्तो,सन्दूक और तराजू

अतीत के प्रसंग प्रायः पीतल के बर्तनों की तरह होते हैं । यदि उन्हें यादों की माटी से घिसा--चमकाया न जाए तो वे धुँधले--मटमैले होजाते हैं । लेकिन कुछ प्रसंग कुछ लोग और कुछ चीजें दिल--दिमाग से कभी नही निकलतीं । उन्हें याद करना नहीं पडता बल्कि जब-तब होती रहती अनुभूतियों की बौछारों से कीडों--मको़डों की तरह खुद-ब-खुद सतह पर आकर कुलबुलाती रहतीं हैं । यह प्रसंग मुझे आज भी उतनी ही तीव्रता के साथ याद है । तब मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में थी । मेरी माँ बामौर के पास एक गाँव में बालबाडी स्कूल चलाती थी । पिताजी बडबारी में सरकारी मास्टर थे और मैं नानी के पास रहती थी । मुझे नानी के पास मेरी मर्जी से नही कुछ जरूरतों के कारण छोडा गया था । एक तो मेरे छोटे भाई ने आने में बहुत ही जल्दबाजी दिखादी थी । मेरी वजह से माँ भाई की देखभाल ठीक से नहीं कर सकती थी । या यह भी हो कि उसके कारण माँ मेरा ध्यान नही रख सकतीं हों । उधर नानी अकेली गाय-बछडे के साथ मन बहलातीं रहती थी और अपना समय किसी तरह काट रहीं थी । मेरे नानी के पास आजाने से माँ को राहत मिल गई और नानी को भी । यह बात अलग है कि मेरी राहत के बारे में किसी ने नही सोचा था । किसी को भी यह खयाल न था कि मुझे भी माँ की बेहद जरूरत है । दरअसल हमारे यहाँ बच्चों को महत्त्व देने की ,उनकी भावनाओं के खयाल की थोडी बहुत समझ अभी-अभी आई है । वरना वे ,रामभरोसे पर्वत पर हरियाने वाले बिरबों की तरह जो अनायास ही उगआते हैं ,पल बढ जाते हैं । कम से कम अपने लिये मैंने यही महसूस किया था । दूसरे तमाम बच्चों की तरह ही मैं भी---मैं कौन हूं, किसलिये हूँ, क्या कर सकती हूँ और क्या करना चाहिये ,यह जाने बिना ही बडी हुई थी । खैर., अपनी समझ में वो मुझे बहुत प्यार करती थीं पर प्यार का मतलब सिर्फ अच्छा खाना या हर वक्त नजर रखना ही तो नहीं होता । नानी मुझ पर हमेशा नजर रखती थी कि मैं स्लेट लेकर बैठी हूँ या नही ..सबक याद किया कि नहीं । वे जब खेत में मूँगफली या आलू खोदतीं थी ,मुझे चुपचाप खेत की मेंड पर बैठना होता था । उन्हें मंजूर न था कि मैं रेंहट के पानी के साथ दूर..वहाँ तक जाऊँ जहाँ गीले खेत में बगुले जाने क्या कुछ खोजते रहते थे । या उनके पास बैठ कर मूँगफली के पौधों में लटकी मूँगफलियाँ गिनूँ । "मिट्टी में कपडे खराब हो जाएंगे"-वो यही कह मुझे डाँट देतीं थीं । वास्तव में इसमें नानी का जरा भी दोष नहीं था । वे तो बस पिताजी के बताये रास्ते पर चलने की कोशिश करतीं थी । और पिताजी भी कहाँ गलत थे। वे अपनी बेटी को पढाना और सिर्फ पढाना और पढ लिख कर आगे बढते हुए देखना चाहते थे । उनका विचार था कि होश सम्हालते ही बच्चे को पढाई की तरफ मोड देना चाहिये । वरना वह भटक जाता है। जाहिर है कि मेरे लिये भी केवल एक काम था ,पढना और केवल पढना...। गुड्डे-गुडिया,झूला .कंगन .रिबन.मेला .साँझी-झाँझी...सब कुछ फालतू चीजें थी मेरे लिये । मैं प्रायः अपने दायरे में ही खडी बडी हसरत से मिलजुल कर धमा-चौकडी मचाते खेलते बच्चों को देखा करती थी । किसी बात के लिये माँग या जिद करना मुझे अपनी हद बाहर जाना लगता था । ऐसे में लीला का मेरी सहेली बनना तब मेरे लिये रास्ते में पडे मिल गए सिक्के से कम नही था । लीला मेरी हमउम्र तो थी । लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति काफी मजबूत थी । उसके पिता का जितना रुतबा मर्दों में था उससे कहीं ज्यादा माँ का औरतों में था । जाहिर है कि लीला को खुद किसी को मित्र या सहेली बनाने की गरज नहीं थी । गाँव के बच्चे उसके आगे-पीछे फिरते थे । उन्हें लीला का कोई भी काम ,(जैसे लीपने के लिये गली में से गोबर समेटना, झाडू लगाना, या पौधों में पानी देना ,)करने में ऐतराज न था । ऐसे में लीला का मुझे सहेली बनाना मेरे लिये नियामत जैसा था । और आश्चर्य भरा भी । उसने मुझे छोटे कामों,(झाडू लगाना आदि ,)से तो मुक्त रखा ही ,मौका पाकर कालू और भूरी को भी धुन डाला जो मुझे अक्सर चिढाते रहते थे । रास्ता रोककर तंग करते थे । यही नही ,स्कूल में जब कोई इंस्पेक्टर या टीका लगाने वाला आता ,जो मेरे लिये काफी भयानक होता था,तब लीला स्कूल से भागने में मेरी मदद करती थी । मैं इतनी अभिभूत थी कि उस वक्त सोच ही नही सकी कि लीला आखिर मुझ जैसी मामूली लडकी को इतना भाव क्यों देरही है । पर धीरे -धीरे बात मेरी समझ में आने लगी । और वह बात यह थी कि मेरे पास एक बहुत सुन्दर पुत्तो (गुडिया) थी जिसे मैंने गहनों-कपडों से खूब सजा रखा था ।एक छोटी सी सन्दूक थी जो कभी किसी शाही आदमी का सुपारीदान रही होगी । इनके अलावा एक छोटी तराजू भी थी जो पकी निबौलियों से आम बेचने का खेल खेलने के काम आती थी । ये चीजें मेरे लिये किसी गरीब की गुल्लक जैसी थी।
कहीं खोने या छिनने के डर से मैं इन्हें बाहर भी नहीं निकालती थी । लीला ने जब ये चीजें देखी तो वह न केवल मेरे और करीब आगई बल्कि वह मेरी इज्जत भी करने लगी । यही नही वह मुझे दूसरी लडकियों की तरह अपने घर न बुला कर खुद मेरे घर आजाती थी । तब अपनी उन चीजों के लिये मुझे गर्व महसूस हुआ । मन में अपने लिये विश्वास भी जाग उठा था । सच अपने प्रति विश्वास ,अपने कुछ होने का अहसास कितना स्वप्निल होता है । कितना उल्लासमय कितना रोमांचक, और कितना ऊर्जामय भी ।
कुछ दिन यूँही गुजर गये ।
एक दिन जब मुझे अपनी माँ और छोटे भाई की बहुत याद आ रही थी ,लीला ने मुझसे एक बहुत ही पिघलादेने वाला सवाल किया -"ऐ री क्या तेरा मन अपनी माँ और भाई से मिलने का नहीं होता ?"
"मन होने से क्या होता है !"-मैं उदास होकर कहा।
"अरे पागल मन से ही तो सब होता है" --उसने गहरी आत्मीयता के साथ कहा । और इसके बाद उसने जो योजना बनाई, सुन कर मैं उसकी सूझ-बूझ और साहस की कायल होगई । न कहने का तो उसने मौका ही नही दिया ।
बोली--"अगर तू वास्तव में जाना चाहती है तो जाना जरा भी मुश्किल नही है । मैंने अपने बापू से सब पता कर लिया है । रेलगाडी एकदम बुआ (मेरी माँ) के द्वार पर ही रुकती है । बस तुझे घर से निकलने का मन बनाना है ।"
"सच्ची !"--मैं पुलकित होउठी ।
और फिर कुछ और तर्क-वितर्कों..सवाल-जबाबों के बाद वह मुझे यह विश्वास दिलाने में सफल हो ही गई कि चाहें तो हम बामौर जासकते है ।
"तो अपन कल ही चलते हैं "--मुझे मौन देख कर लीला उत्साह के साथ बोली--"मेरी दादी कहती थी कि शुभ काम में देर नही करनी चाहिये ।" मैं एक बार फिर अभिभूत होगई । लीला को हर बात की कितनी जानकारी है । मैं तो एकदम बुद्धू हूँ । उस समय माँ और डब्बू से मिलने की ऐसी उमंग जागी कि उससे एक भी सवाल न पूछा कि कैसे क्या होगा ! इससे पहले वह अकेली कभी कहीं गई नही है तो भला अब कैसे जायेंगी ?क्या मामी (लीला की माँ) जाने देंगी ?पर इस तरह से बुद्धिमान लोग सोचा करते हैं । स्नेह और सम्बल की तलाश में भटकते हुए कमअक्ल नही ।
यह सब लीला मेरे लिये ही तो कर रही है । वही तो है, जिसने मेरी भावनाओं को समझा है । नानी और पिताजी तो कई बार रोने व जिद करने पर भी ले जाने तैयार नही हुए थे । मैं तब सिर्फ यही सोच रही थी ।
"तो फिर अपने कपडे आज ही लाकर मेरे पास रखदे । कल उजाला होने से पहले ही निकल चलेंगे । और ध्यान रहे इस बात का किसी को पता न चले । नानी को तो हरगिज नही ।"--लीला ने मुझे समझाया और फिर फुसफुसाते हुए कहा--"और हाँ तू अपनी पुत्तो,सन्दूक और तराजू को लाना मत भूलना ।"
"इन्हें..क्यों ?"----पहली बार मेरे मन में सवाल उठा जिसका उत्तर देकर लीला ने मुझे पूरी तरह निरुत्तर और सन्तुष्ट कर दिया---"पागल ! यहाँ छोडेगी तो कोई भी चुरा लेगा । तेरी नानी क्या हर समय घर में बैठी रखवाली करती रहेंगी और फिर क्या इन चीजों को तू अपने छोटे भैया को नही दिखायेगी ? जरा सोच कि देख कर वह कितना खुश हो जाएगा ।" ऐसे नेक विचारों के बाद क्या शक की कोई गुंजाइश थी ?
मैं शाम को ही नानी से छुपा कर अपने कपडे और वे तीनों चीजें-- पुत्तो , सन्दूक और तराजू ,लीला को दे आई । देते समय लगा जैसे कोई कंजूस अपनी सारी जमा--पूँजी किसी को सौंप रहा हो । या कि जैसे कोई माँ अपने नन्हे से कलेजे के टुकडे को पहली बार कहीं दूर पढने भेज रही हो ।
"सुबह जल्दी आ जाना ।"लीला ने कहा और सारे सामान को फिर से जमाने लगी ।
रात भर मारे उल्लास के ,साथ ही भय और सन्देह के मुझे नींद नही आई । कैसे जाएंगे । रेल में कोई पकड तो न लेगा । माँ खुश होंगीं या डाँटेंगीं । मुझे न पाकर नानी पर क्या गुजरेगी
पर इन सारी बातों से ऊपर यह संकल्प था कि मुझे सुबह जल्दी लीला के घर जाना है । उजाला होने से पहले । ताकि कोई देख न ले ।
गनपति मामा के मुर्गे की पहली बाँग पर ही मैं नानी को सोती ही छोड कर लीला के घर पहुँच गई ।
उसने मुझे देखते ही एक चौंकाने वाला सवाल किया--"इतनी सुबह तू क्या कर रही है यहाँ ?"
"अरे ! तूने ही तो जल्दी आने को बोला था और तू भूल भी गई ।"--मैंने चकित होकर कहा । वह उठ कर बैठते हुए बोली--"अरे हाँ..। पर ,अरे री मैं तुझे बताना भूल गई । कल बापू ने बताया कि आजकल रेलगाडी बन्द है । अभी तो जा ही नही सकते ।"
"कल ? पर कल ही तो अपनी बात हुई थी ।" मैने थोडी बुद्धि लगाई ।
"हाँ ,लेकिन बापू ने रात को बताया । "
"तो फिर ?"---मैंने हताश होकर पूछा ।
"फिर क्या !" लीला लापरवाही से बोली --"कुछ दिन बाद चलेंगे ,जब रेलगाडी चलेगी ।अपन को चलना तो है ही ।"
"फिर मेरा सामान ? अभी तो ले ही जाती हूँ ।"--मैंने कुछ शंकित होकर अपना सामान को, जो कहानी के राक्षस की जान की तरह लीला के पास रखा था ,ले जाने की बात कहनी चाही । तो उसने मुझे लगभग झिडकते हुए कहा---
"सामान क्या कहीं कहाँ भागा जा रहा है । अपन को चलना है ना । कि नही चलना ।"
"चलना है ।" मैंने कहा तो वह बडप्पन के साथ बोली---" देख ,थैला तो जमा हुआ रखा रहेगा ही । जब भी मौका मिलेगा अपन निकल भागेंगे । है न ?"
मैं निरुत्तर हुई लौट आई । कुछ दिन मैंने गाडी के शुरु होने की प्रतीक्षा की और कुछ दिनों तक वह मुझे नई-नई जानकारियों में अटकाए रही कि रास्ते में जो जंगल पडता है उसमें कई बघेर्रा (बाघ )आगए हैं । कि नदी का पुल टूट गया है और कि टीका लगाने वाले आजकल बामौर में ही हैं। वे चले जाएं फिर चलेंगे ।
कहने की जरूरत नही कि न वह रेलगाडी फिर कभी चली ,न हम कभी बामौर जा सके । हताश होकर
जब मैं लीला से अपना सामान माँगने गई तो उसने बडी कटुता व निस्संगता के साथ केवल मेरी फ्राक मेरी ओर फेंक दी । मैं हैरान । लीला पूरी तरह बदली हुई थी ।
"और मेरी पुत्तो ?सन्दूक ??और तराजू ???--मैंने तेज हुई धडकनों को किसी तरह सम्हालते हुए पूछा । मेरी सबसे प्यारी चीजें तो उसी के कब्जे में थी । पर मेरी बात सुनते ही लीला के तेवर और भी रूखे होगये । आँखें निकाल कर बोली--"कैसी पुत्तो ?कौनसी सन्दूक ??किसकी तराजू ??? झूठी कहीं की मुझपर इल्जाम लगाती है ? अभी बताऊँ ?? मैंने जब अपनी बात दोहराने की कोशिश की तो वह निचले होठ को दाँतों में दबा कर ,मुक्का तान कर आक्रामक मुद्रा में आगई और मुझे धक्का देते हुए बोली--"चल भाग हमारे घर से । अब इधर आई तो ठीक न होगा समझी ! बडी आई पुत्तो, सन्दूक और तराजू वाली ।"
सच कहूं तो सीधी-सादी स्नेहमय भाषा का उत्तर तो मुझे आता है पर छल, उपेक्षा घृणा और जटिलता के उत्तर देने के समय में मेरी बोलती बन्द हो जाती है । एक शब्द नही सूझता । बुद्धि काम ही नही करती । तब भी यही हुआ । वैसे वहाँ कोई मेरी मदद करने वाला भी नही था । जब नानी को पता चला तो उन्होंने भी मुझे ही डांटा । बोलीं--"अपनी चीजें खुद ही तो जाकर दे आई अब रोती क्यों है ? भुगत...।"
मैं अपनी तीनों चीजों के साथ लीला की कटुता के लिये भी वर्षों रोती--कलपती रही । आज भी उन चीजों को याद करते समय अपने अन्दर उस छोटी बच्ची को महसूस करती हूँ । यह तो मेरी समझ में बहुत बाद में आया कि बामौर जाने का नाटक उसने केवल मेरी उन तीनों चीजों को हथियाने के लिये ही रचा था । और तब सचमुच मेरा दुख कई गुना बढ गया । वह मेरी चीजों को माँग लेती या छीन लेती तो इतना मलाल न होता । छल--फरेब से छुडाने का यह उसका अपना तरीका था ,जिसका दर्द मुझे जितना तब हुआ ,उतना ही( बल्कि उससे कहीं ज्यादा ),आज भी है । क्योंकि कहीं न कही आज भी मेरे साथ वैसा ही कुछ है । प्रायः स्नेह, विश्वास और उम्मीद के उत्तर में उपेक्षा, छल और निराशा ही मिलती है और तब मुझे बरबस लीला याद आजाती है । लगता है कि फिर किसी लीला ने मुझसे मेरी पुत्तो ,सन्दूक और तराजू छीन कर अपने घर से भगा दिया है ।

Sunday, August 21, 2011

मान्या और विहान




नन्हे राजा
नयना बाँके-बाँके
कोटर में से
कोयल के शिशु झाँके
नदी नहायी धूप
चाँदनी फाँके
कितने सारे फूल
भोर ने ,
हर टहनी पर टाँके
लुढक गई है गेंद
रात की काली वाली।
जाने दो,
झुनझुना बजाती
डाली-डाली


मेरी गोदी चाँद सलौना
नही चाहिये और खिलौना
साथ इसी के खेलूँगी मैं,
सौ सौ नखरे झेलूँगी मैं
मेरा राजा भैया है
मेरी जेब रुपैया है ।

Sunday, July 31, 2011

वे दो शब्द

वे दो शब्द--
मरहम से,
दे दो उसे
जो गिरा है अभी-अभी
लगा लेगा
अपने ताजा जख्मों पर ।

वे दो शब्द--
उत्तीर्ण होने की सूचना जैसे,
पेपर बिगडने के बावजूद
दे दो उसे ।
जो फेल होजाने पर
शर्मिन्दा हो ।
अपने आप से
चल सके फिर से
नये हौसले के साथ ।

वे दो शब्द-
अनायास ही
किसी किताब के पन्नों में मिल गये,
नोटों जैसे
दे दो उसे
जो तलाश रहा हो बेचैनी के साथ
अलमारी का कोना-कोना
पर्स गुल्लक तकिया बिछौना
एक-एक अठन्नी के लिये
महीने के आखिरी दिनों की
तंगहाली में ।

Tuesday, July 26, 2011

चलते--चलते

सीट-1
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गाडी जैसे ही स्टेशन पर रुकी । अनारक्षित डिब्बों में लोगों ने अपनी-अपनी सीट सम्हाली ।किसी ने पाँव पसार लिये किसी ने बैग रख लिया । जो लोग टायलेट के लिये निकले थे वे भी लौट कर अपनी सीट पर जम गए । पता नही कौन आकर बैठ जाए । और एक बार जम गए व्यक्ति को हटाना बडा मुश्किल होता है ।ऐसे में ही भीड का एक रेला डिब्बे में घुसा ।लोग चल कर नही मानो धक्कों के सहारे आगे बढ रहे थे । जैसे कोई बेतरतीबी से थैले में कपडे ठूँसे जारहा हो । पसीने की गन्ध मिश्रित भभका साँसों में घुटन पैदा करने लगा । सीट पर बैठे लोगों को यह आपत्ति थी कि खडे लोगों की भीड ने हवा का रास्ता भी बन्द कर दिया था ।वहीं खडे लोग कहीं किसी तरह पाँव रखने की जगह बना रहे थे और बैठे लोगों से कह रहे थे --"भैया यह सीट छह लोगों की है और बैठे पाँच ही हैं ।"
पहले तो बैठे लोगों ने यह बात सुनी ही नही । पर जब यही बात कई बार दोहराई तब एक ने ऊँघते हुए कहा--"दूर से आ रहे हैं भैया । थके हैं । आगे चले जाओ । डिब्बा खाली पडा है ।"
"बैठे--बैठे भी तकलीफ हो रही है तुम्हें । एक आदमी जो कुछ पढा-लिखा लगता था ,बोल उठा---आराम करना था तो घर पर ही रहते न !"
"किराया हमने भी दिया है । कोई सेंतमेंत नही जा रहे ।"--एक दूसरे यात्री को भी बल मिला ।
वही एक अधेड उम्र के सज्जन भी खडे थे ।ऊपर को सँवारे हुए खिचडी बाल ,लम्बी और आगे को झुकी नाक ,आँखों में अनुभव की चमक ।सफेद लेकिन कुछ मैले कुरता-पायजामा और कन्धे में लटका खद्दर का थैला उन्हें सबसे अलग बना रहा था । वे बडी व्यंग्य भरी मुस्कान लिये लोगों का वार्तालाप सुन रहे थे । मौका पाकर बोले--"जमाना ही बदल गया साहब । आदमी की गुंजाइश खत्म हो रही है वरना दिल में जगह हो तो कहीं कोई रुकावट है ही नही । पहले जवान लडके बुजुर्गों व महिलाओं को उठ कर जगह देते थे ।पर आज खुद को जगह मिल जाय बस...। अरे कुछ घंटों का सफर है । कोई लग कर यहाँ रहना तो है नही । सीट कोई अपनी पुश्तैनी थोडी है ।"
उन सज्जन की बातों से प्रभावित होकर लोगों ने सरक कर उनके लिये जगह बनादी ।उनके चेहरे पर असीम सन्तोष छागया । बैठ कर वे अपने अनुभव लोगों को सुनाने लगे । पर जैसे ही अगला स्टेशन आया वे कुछ अस्थिर व सजग होगए ।
इस बार उनकी सजगता व व्यग्रता सीट पाने की नही ,सीट बचाने की थी ।वे आने वाले हर यात्री से कह रहे थे --भैया जी आगे जाओ पूरा डिब्बा खाली पडा है
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सीट---2
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यह वर्षों पहले की बात है । जब एक दिन बस से मैं अकेली अपने गाँव लौट रही थी । जौरा बस स्टैण्ड पर जब बस पाँच मिनट के रुकी तो अमरूद खरीदने का विचार आय़ा । मैंने अपना बैग सीट पर रखा । बगल वाली सीट पर बैठे सज्जन को जता कर मैं फल खरीदने चली गई और दो ही मिनट में जब लौटी तो मैंने अपनी सीट पर एक सहारिया-महिला को बैठी पाया जो लकडियाँ बेच कर घर लौट रही थी । वह मेरे विरोध--भाव से पूरी तरह बेखबर सी इस तरह बैठी थी मानो वह सीट सदा से उसी की है । मेरा बैग हटा कर उसने एक तरफ नीचे रख दिया गया था । पहले तो मुझे गुस्सा आया । पर वैसा ही जैसा अखबार की खबरें पढते--पढते आता है । वह मेरे गुस्से से अप्रभावित ,अनजान ,अविचल भाव से बैठी रही ।
"यह सीट तो मेरी है । तुम कही दूसरी सीट देखलो ।"--मैंने खुद को संयत कर कहा ।
मेरी इस बात पर उस महिला ने पहले तो मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई अनधिकृत बात कह दी हो । और फिर बडे खरखरे से लहजे में बोली-- "काए, सीट पै का तेरौ नाम लिख्यौ है ? तुई कौं नई देखि लेती अपने काजैं सीट ?"
मैने आसपास देखा लोग दबे--दबे मुस्करा रहे थे । मुझे लगा कि एक अनपढ मजदूर महिला से विवाद करना ठीक न होगा । इसलिये मैं पीछे एक सीट पर जगह बना कर बैठ गई ।
लेकिन वर्षों बाद मुझे ,लकडियाँ बीन-बेच कर गुजारा करने वाली उस जाहिल आदिवासिन की उस बात के मायने समझ आए हैं कि सीट कैसे हासिल की जाती है । और इसके लिये पढा-लिखा व समझदार होना कतई जरूरी नही है । साथ ही यह भी कि ,सीट हासिल करना ही काफी नही होता ,उसे बचाए रखने की कवायदें भी जरूरी है । हालाँकि मैं इसे आजतक सीख नही पाई ,पर यह अलग बात है ।

Friday, July 22, 2011

सूरज के साथ-साथ

सुबह--सुबह सूरज के साथ
उतरती है...गूँजती है
उनीदी अलसाई सी गली में
एक सत्तर साल के
आदमी की आवाज--
दूध ले लो...दूध
ठकुराइन..मिसराइन..
ओ दुकान वाली पंडिताइन
दूध ले लो ...।
उसे परवाह नही कि
साँसों के भँवर में डूबती हुई सी
उसकी आवाज काँपती है
झरोखों से झाँकती हुई सी आँखें
जैसे आखिरी पडाव तक की
दूरी नापतीं हैं ।
अपना ही बोझ उठाने में असमर्थ से पाँव
डगमगाते हैं
सूराख वाले जूतों को घसीटते हुए से
कसमसाते हैं ।
और ...कि,
दमा की बीमारी बलात् ही
खीचना चाहती है उसे अस्सी तक
उसे परे हटाता है
दूध भरी बाल्टी का बोझ उठाए
वह रोज आता है ।
सूरज के साथ--साथ ।
उसे बचाना जो है ,अपने आप को
'निठल्ला' और ,रोटी-तोडा'
जैसी उपाधियों से ।
निकट आती नीरव शाम के धुँधलके तक
समेट लेना है उसे निरन्तर
ढेर सारी धूप अपने अन्दर ।
और मुस्कराते देखना हैं उसे
अपने पोते--पोतियों को
उनकी नन्ही कोमल हथेलियों पर
चाकलेट व बिस्किट रखते हुए ।
वह सत्तर साल का बूढा
दूध के साथ भर जाता है
भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
और उल्लास भी ।
सुनहरी धूप सा
एक विश्वास भी...।
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Sunday, July 10, 2011

कंगाल

खेत में झूलती बाजरे की रुपहली बालों को देख कर जिस तरह किसान की आँखें तृप्त होजाती हैं, उसी तरह अपने जवान और कमाऊ बेटे को देख कर विसनू की आखें तृप्त होगईं ।
"माँ की बीमारी की बात सुनी तो आना ही पडा बापू नही तो आजकल छुट्टी मिलना भारी मुश्किल है "---राकेश ने जूते उतार कर खटिया के नीचे सरकाते हुए कहा ।
तब तक रतनी ने हुलसते हुए नई दरी खटिया पर डालदी । दुबले पतले शर्मीले से राकेश की जगह ऊँचे और भरे-पूरे शरीर वाले ,सूट-बूट में सजे-सँवरे राकेश को देख रतनी का मन आषाढ-सावन की धरती हुआ जारहा था ।जिसमें अनगिन लालसाएं अंकुर की तरह फूट निकलीं थी । दो दिन पहले जो उसे साल भर बाद बेटे के आने की खबर लगी तो घर-आँगन लीप-पोत कर चौक पूर कर दीपावली की तरह सजा लिये थे । वैसे भी लक्ष्मी और कब तक रूठी रहेंगी रतनी से । रामदीन काका कह रहे थे कि "राकेश के यहाँ तो कपडे भी मशीन से धुलते हैं । भैया , गंगा में जौ बोये हैं विसनू ने ।"
"तो विसनू भैया ने भी राकेश की पढाई में कोई कसर नही छोडी । फटा-पुराना पहन कर , रूखा-सूखा खाकर भी कभी किसी के आगे तंगी का रोना नही रोया । इस पर भी दूसरों के लिये कभी ना नही निकला विसनू और उसकी घरवाली के मुँह से । भगवान एक दिन सबकी सुनता है ।"
गाँव वालों के मुँह से ऐसी बातें सुन विसनू का रोआं रोआं खिल जाता । आदमी की सबसे बडी कमाई तो यही है कि चार लोग सराहें ।
रतनी ने बेटे की मन -पसन्द भाजी बनाई थी । हुलस कर पंखा झलती हुई खाना खिलाने लगी ।
"बेटा बहू और मुन्नू को भी ले आता "-----विसनू बेटे के पास बैठ गया । वह बेटे से बहुत कुछ कहना चाहता था कि अब गाँव का माहौल बिगड रहा है इसलिये रज्जू को अपने साथ ले जा । कि बेटा इतने--इतने दिन मत लगाया कर आने में । कुछ नही तो एक चिट्ठी ही डाल दिया कर नही तो सरपंच काका के फोन पर फोन कर दिया कर । कि बेटा तू इधर ही बदली करवा ले ,हम लोगों को सहारा हो जाएगा ।.....
....और विसनू , बेटे के मुँह से सुनना भी चाहता था कि बापू मैं आँगन में ही एक हैंडपम्प लगवा देता हूँ । माँ कब तक बाहर से पानी ढोती रहेगी । कि किश्तों से कर्ज पटाने की क्या जरूरत बापू । मैं एकमुश्त रकम भर देता हूँ । कि एक दो पक्के कमरे बनवा लेते हैं । अब माँ को मिट्टी-गारा करने की क्या जरूरत । और..कि बापू अब तुम अकेले नही हो । गृहस्थी की गाडी खींचने में मैं भी तुम्हारे साथ हूँ । साथ क्या अब तो मैं अकेला ही काफी हूँ।----पर राकेश जाने किन खयालों में खोया रहा ।
"और शहर में क्या हाल-चाल हैं बेटा ?"--- आखिर विसनू ने बेटे की चुप्पी तोडने की कोशिश करते हुए पूछा ।
"सब ठीक हैं बापू ।"
"और... आमदनी वगैरा...।"
"आमदनी की क्या बताऊँ बापू ---शहर में जितनी आमदनी , उतने ही खर्चे हैं । मँहगाई आसमान छू रही है । मकान किराया, बिजली ,पानी और फोन के बिल...दूध--सब्जी दवाइयाँ..डा.की फीस ..तमाम झगडे हैं ।इस बार साइड नही मिली तो ऊपर की इनकम भी नही है । उस पर आने-जाने वालों का अलग झंझट..।"
विसनू ने हैरानी के साथ देखा कि सब--इंजीनियर राकेश की जगह कोई बेहद तंगहाल ,लाचार सा अनजान आदमी बैठा है । मन की सारी बातें मन में ही दबा कर उसके मुँह से बस इतना ही निकल सका---
"बेटा हाथ सम्हाल कर खर्च करो । जरूरत पडे तो राशन पानी घर से ले जाओ । और क्या....। हमने तो सोचा था कि एक बेटे को पढा कर हम निश्चिन्त होगए हैं पर .....।"

Sunday, June 26, 2011

चलते-चलते

बात एक रुपया की
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ग्वालियर से मुरैना जाने वाली एक प्राइवेट बस । जैसा कि अक्सर ही कण्डक्टर को यात्रियों से किराए के लिये जूझना पडता है ,वह एक लठैत किस्म के यात्री से उलझ रहा था ।
"चल एक रुपया और निकाल ।"
"काय का एक रुपैया ।"
"किराए का और काए का ।"
"बस पे नया आया है क्या ?
"तू भी क्या पहली बार बस में बैठा है? पता नही है कि किराया बढ गया है ?"
बढे या घटे पर बामौर के अब भी पाँच ही लगते हैं ।"
"अगर तू लगने की कहे तो फिर लगते तो दस है ।"
"ऐसी-तैसी दस लगते हैं । का हमसे ही लखपती बनैगौ तू ।"
"चल ..चल टैम खराब मत कर । चुपचाप रुपैया निकाल ।"
"और जो नही निकालूँ तो !"
"निकालता है कि उतारूँ बस से ..ए रोक्के...।" कण्डक्टर ने सीटी बजाई ।
"अच्छा ! आज तू उतार के देखले और फिर कल यहाँ से बस निकाल के बताना -"-इस बार यात्री खडा होगया । दोनों हाथापाई के लिये तैयार । दूसरे यात्री कुछ शंका और कुछ कौतूहल से इस बहस को देख रहे थे । कुछ जल्दी चलने की गुहार भी लगा रहे थे ।
"देख अभी तो पाँच दे भी रहा हूँ नही तो वो भी नहीं मिलेंगे ।"
"किराया तो अब पूरा ही लूँगा नही तो ये ले बस खडी है । सेवकराम गाडी रोक.. ।"-- ड्राइवर सेवकराम ने सडक के एक तरफ बस खडी करदी । कण्डक्टर जुझारू तेवर लिये चेहरे को यात्री की आँखों के पास ले जाकर बोला--
"धमकी देता है बेटा ! ऐसी बन्दरघुडकियों से डर गए तो करली बसबाजी...। रोज तेरे जैसे एक सौ पैंसठ मिलते हैं । समझा । सडक तेरे बाप की नही है जो... ।"
नही , यह बस तेरे बाप की जरूर है । है ना ?
"बाप की न सही ,फूफा की तो है ही ।"
"तब तो तेरे फूफा का नाम सोबरनसिंह ही होगा ।" यात्री ने ठट्ठा करते हुए कहा ।
"सही सोचा है बेटा ! तू भी अच्छी तरह जानले हमारे सोबरन फूफा को और ..."
"तुमसे थोडा ही कम जानता हूँ ।"-यात्री मुस्कराते हुए 'तू' से .'तुम' पर आगया ।
"फिर तो उनसे जरूर तुम्हारा कोई नाता है ।"
"वो मेरे भाई के चचिया ससुर हैं ।"
"ओ.. तो तुम लाखन के भाई हो !" कन्डक्टर थोडा लज्जित हुआ सा मुस्कराया ।
"भाई ही समझ लो । हमारी उनकी दाँत काटी रोटी है ।"
ओ ! अरे !! अच्छा !!! .....दोनों ने पहले एक दूसरे को अचरज और पुलक के साथ देखा और ठहाका लगा कर हँस पडे ।
"हाँ तो ले लो भैया अपना एक रुपया । धन्धे में नातेदारी नही चलनी चाहिये ।" यात्री ने हँसते हुए रुपया बढाया और कण्डक्टर ने कानों से हाथ लगा कर कहा -----"अरे तुम नातेदार निकले । अब क्या नरक में भिजवाओगे ।"
कण्क्टर ने किराया तो लौटाया ही ऊपर से ग्यारह रुपए भेंट कर पाँव छुए । दोनों के साथ--साथ सारे यात्री भी हँस पडे ।

Sunday, June 12, 2011

आज की कविता

कौन कहाँ ठहरा है बाबा !
राज़ बडा गहरा है ।
पूरब-पश्चिम , उत्तर दक्षिण
बाहर दिखे न कोई लक्षण ।
लेकिन अन्दर झाँकोगे तो,
नस-नस भेद भरा है बाबा !
राज़ बडा गहरा है ।
साथी कबके वाम होगए !
छल के किस्से आम होगए ।
बैठे--ठाले कामयाब हैं ,
मेहनतकश नाकाम होगए ।
रूखे--सूखे पेडों का,
यह कैसे रंग हरा है बाबा !
राज़ बडा गहरा है ।
कितनी दीवारों के अन्दर !
कितने दरवाजों को तय कर !
तालों और तालों के भीतर ,
छुपा रखा सोने का तीतर ।
कैसे बाहर लाओगे तुम ?
देखो मुँह की खाओगे ।
और किसे समझाओगे तुम
हर कोई बहरा है बाबा !
राज़ बडा गहरा है ।
सत्ता के जो गलियारे हैं
लगें बडे उजियारे हैं ।
छिपा सके जो अँधियारे को
उनके वारे--न्यारे हैं ।
कैसे क्या कुछ अर्जित है !
इसे खोजना वर्जित है ।
केवल उसका ही डर है
चौराहा जिसका घर है ।
अपनी उसे चलाने से
सच की दाल गलाने से
बरबस रोका जाएगा
हर शय टोका जाएगा ।
देखो भाले तने हुए
मक्कड--जाले बुने हुए
जो आवाज उठाते हैं
मुफ्त सताए जाते हैं ।
कैसे व्यूह तोड पाओगे
बडा कठिन पहरा है बाबा !
राज़ बडा गहरा है ।
फिर भी आगे आना है ?
तन कर शीश उठाना है ?
सिर पर एक कफन कसलो
जान हथेली पर रखलो
संभव है ओले बरसें
बारूदी गोले बरसें
कीचड सिर तक आएगी
धूल नज़र भर जाएगी ।
कण्टक पग में अखरेंगे
रोडे पथ में बिखरेंगे ।
तूफां से लडना होगा ।
पर्वत सा अडना होगा ।
अपनी राह बना कर चलना
काँटों का सेहरा है बाबा,
राज़ बडा गहरा है ।

Wednesday, June 1, 2011

ऊँचाई पर----दो व्यंजनाएं

(1)एक विस्तार
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एयर इण्डिया के विमान में
उडते हुए मैंने देखा कि
विशाल और शानदार दिल्ली शहर ,
जो धीरे--धीरे सिमट कर
बदलता हुआ सा लग रहा था
पत्थरों के ढेर में ,
अचानक अदृश्य होगया था
मानो रिमोट का गलत बटन दबाने पर
टी .वी. पर चलता कोई दृश्य
कहीं खोगया था ।
बहुत नीचे छूट गए थे
पहाड ,जंगल ,नदियाँ ।
अब कहाँ ! ,वे मोहल्ले की
छोटी--छोटी गलियाँ ।
घर--आँगन कमरे दीवारें...
दीवारों में कैद
मान--मनुहार
नफरत या प्यार
संघर्ष और अधिकार
द्वेष या खेद का
रंग और भेद का
नही था कोई रूप या आकार
धरती से हजारों मीटर ऊपर
चारों और था एक शून्य
असीम , अनन्त
दिक् दिगन्त ।
अहसास था केवल
अपने अस्तित्व का
या फिर गंतव्य तक पहुँचने का ।
शायद ,ऊँचाई पर पहुँचने का अर्थ
मिटजाना ही है ,सारे भेदों का ।
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(2) मुहावरों का फर्क
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एक अपार्टमेंट की
छठवीं मंजिल पर
सर्वसुविधा-युक्त फ्लैट
धूल, कीचड और दुर्गन्ध से मुक्त
देख सकती हूँ यहाँ से
चारों ओर ऊँची--ऊँची इमारतों की सूरत में
उग रहा शहर
सडकों पर रेंगते छोटे--छोटे आदमी
छोटी ,खिलौने सी कारें
इतनी ऊँचाई पर खडी
सोचना चाहती हूँ कि
अच्छा है ,परे हूँ अब-
गर्द--गुबार से ।
कीचड में खेलते बच्चों की
चीख-पुकार से ।
सब्जी वाले की बेसुरी सी आवाज
या पडौसन के खरखरे व्यवहार से ।
दूध लाने वाले बूढे की आह से भी
और किसी इमारत की छाँव में
दो पल को सुस्ताने बैठी
मजदूरिन की हसरत भरी निगाह से भी ।
महसूस करना चाहती हूँ कि
इसी को कहते हैँ
"पाँव जमीन पर न होना"
पर जाने क्यों
मुझे याद आता है -
"पाँव तले जमीन न होना ।"
छठवीं मंजिल के इस सर्वसुविधा-युक्त फ्लैट में
मानो अपने आप से ही दूर
सपाट.....संवेदना--शून्य
कहीं अधर में टँगी हुई सी मैं !
अक्सर करती हूँ
दोनों मुहावरों का विश्लेषण ।
और पाती हूँ कि ,
भले ही पाँव जमीन पर न हों लेकिन,
बहुत जरूरी है पाँवों तले जमीन होना ।
खुद के करीब रहने के लिये..।

Wednesday, May 18, 2011

एक साल

19 .5 .2011
आज काकाजी (पिताजी) को गए एक साल हो गया । धरती ने भले ही पूरे तीन सौ पेंसठ दिन पार कर लिये है पर मन तो जैसे एक पग भी नही चल पाया है । वह स्मृतियों की दीवार के सहारे खडा उस गहरे गड्ढे को देख रहा है जो एक वृक्ष के उखडने से हुआ है और जिसके कारण आगे जाने का रास्ता ही बन्द हो गया है । सावन--भादों की झडी उसमें एक इंच मिट्टी तक नही डाल पाई है ।
कितनी अजीब बात है कि एक घटना जो दूसरों के स्तर पर हमें सामान्य लगती है अपनी निजी होने पर अति विशिष्ट होजाती है । दूसरों की नजर से देखें तो काकाजी का जाना कोई खास दुखद घटना नही है । पिचहत्तर पार चुके थे । हड्डी टूट जाने के कारण ढाई महीनों से बिस्तर पर थे । उनके बच्चों के बच्चे तक लायक हो चुके हैँ विवाहित होकर माता-पिता बन चुके हैं । पर मुझे अभी तक जाने क्यों लगता है कि कही कुछ ठहर गया है ,कुछ शेष रह गया है । अगर बचपन कही ठहर जाता है तो आदमी आजीवन उसके चलने की प्रतीक्षा में बच्चा ही बना उम्र तमाम कर लेता है । मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है । जैसे जमीन से वंचित गमले में ही पनपता एक वृक्ष बौनसाई बन कर रह जाता है । मैं शायद आज भी उन्ही पगडण्डियों पर खडी हूँ जिन पर चलते हुए मैं कभी एक कठोर शिक्षक में अपने पिता की प्रतीक्षा करती हुई फ्राक से चुपचाप आँसू पौंछती रहती थी । काकाजी और मेरे बीच वह कठोरता दीवार बन कर खडी रही । एक उन्मुक्त बेटी की तरह मैं उनसे कभी मिल ही नही पाई । यह मलाल आज भी ज्यों का त्यों है ।
काकाजी के लिये इस शेष रही पीडा को शब्दों में ढाल देने के प्रयास में मैं सफल हो सकूँ यही लालसा है । आज एक नया ब्लाग शुरु कर रही हूँ --कथा--कहानी । कोशिश करूँगी कि माह दो माह में एक कहानी तो दी जासके। ये वे पुरानी कहानियाँ होंगी जो आज तक पूरी नही हो सकीं हैं । पहली कहानी काफी कुछ (खासतौर पर शिक्षक वाले प्रसंग केवल उन्ही के हैं )काकाजी से प्रेरित है । यह एक परिपूर्ण और अच्छी कहानी तो नही कही जासकती । लेकिन आप सबके विचार मुझे वहाँ तक शायद कभी पहुँचा सकेंगे ऐसी उम्मीद है । आप सबसे अपेक्षा है कि मेरी कहानियों को अपना कुछ समय अवश्य दें ।
यहां उन कविताओं को पुनः दे रही हूँ जिनके साथ --यह मेरा जहाँ --शुरु हुआ । पढ कर अपनी राय से मुझे लाभान्वित करें ।

पिता से आखिरी संवाद
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(1)
आज ..अन्ततः,
तुमने अलविदा कह ही दिया ।
मेरे जनक ।
सब कहते हैं.....और ..मैं भी जानती हूँ कि,
अब कभी नहीं मिलोगे दोबारा..
लेकिन आज भी,
जबकि तुम्हारी धुँधली सी बेवस नजरें,
पुरानी सूखी लकडी सी दुर्बल बाँहें,
और पपडाए होंठ,
बुदबुदाते हुए से अन्तिम विदा लेरहे थे,
मैं थामना चाह रही थी तुम्हें,
कहना चाहती थी कि,
रुको,..काकाजी ,
अभी कुछ और रुको
शेष रह गया है अभी ,
बाहों में भर कर प्यार करना ,
अपनी उस बेटी को ,
जो कभी पगडण्डियों पर चलते हुए,
दौड-दौड कर पीछा किया करती थी,
तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारी उँगली थामने..
रास्ता छोटा हो जाता था
तुमसे गिनती सीखते या
सफेद कमलों के बीच तैरती बतखों को देखते
आज भी.....दुलार को तरसती तुम्हारी वही बेटी
अकेली खडी है उन्ही सूनी पथरीली राहों पर ।
अभी तक पहली कक्षा में ही,
आ ,ई , सीखती हुई ,
तलाश रही है राह से गुजरने वाले
हर चेहरे में ।
तुम्हारा ही चेहरा ।
भला ऐसे कोई जाता है
अपनी बेटी को,
सुनसान रास्ते में अकेली छोड कर ।

(2)
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यूं तो अब भौतिक रूप से,
तुम्हारे होने का अर्थ रह गया था,
साँस लेना भर एक कंकाल का
धुँधलाई सी आँखों में
तिल-तिल कर सूखना था
पीडा भरी एक नदी का ।
उतर आना था साँझ का
उदास थके डैनों पर ।
लेकिन अजीब लगता है
फूट पडना नर्मदा या कावेरी का
यों थार के मरुस्थल में
पूरे वेग से ।
स्वीकार्य नही है
तुम्हारा जाना
जैसे चले जाना अचानक धूप का
आँगन से, ठिठुरती सर्दी में ।
बहुत अखरता है,
यूँ किसी से कापी छुडा लेना
पूरा उत्तर लिखने से पहले ही ।
और बहुत नागवार गुजरता है
छीन लेना गुडिया , कंगन ,रिबन
किसी बच्ची से
जो खरीदे थे उसने
गाँव की मंगलवारी हाट से ।

Wednesday, May 11, 2011

मातृ-दिवस पर दो कविताएं

1---एक नदी
-----------------
एक नदी
अनन्त जलराशि
ह्रदय में समेटे ।
धरती को , सुदूर तक
अनवरत सींचती रहती है
सम्पूर्णता के साथ
अविभाज्यता को
जीते हुए , अविराम
बहती है ।
चट्टानों, रोडों को
अनजाने मोडों को
निर्विकार सहती है ।
साँस लेते हैं आराम से
कितने ही जीवन
लहलहाता रहता है
किनारों का विश्वास
उसके ही नाम से
शान्त विस्तार में जब,
उभर आते हैं कई टापू
उसकी धारा में यहाँ--वहाँ
तब अविभाजित बहने का
उसका संकल्प
बिखर जाता है न जाने कहाँ
नदी बँट जाती है ,
कई धाराओं में
धाराएं होतीं जातीं हैं
क्रमशः क्षीण ,मन्थर...
सूखने लगता है
किनारों का विश्वास
पर कहाँ होती है
क्षीण , मन्थर..
उसकी सींचने की प्रवृत्ति
धरती को नम बनाए रखने का लक्ष्य
नही भूलती नदी
अपने सूखने तक भी
माँ की ही तरह...।
--------------

2---माँ की सोच
--------------
नफरत को अनदेखा करके
देखना सिर्फ स्नेह को ।
प्रतिशोध व ईर्ष्या को हटा कर
रोपना--- वात्सल्य ..प्रेम , ममत्व
और कटुता को भुलाकर
खोजना माधुर्य को
तुम्हारी दृष्टि थी माँ ।
जब हम तुम्हारी तरह से सोचते थे
तब कितना आसान था सब कुछ ।
सब कुछ माने--
कुछ भी मुश्किल नही था ।
जब से हम अपनी तरह सोचने लगे हैं
सन्देह व अविश्वास लग गया है हमारे साथ ।
हमें दिखते हैं केवल दोष ,अभाव
अपनों में भी छल और दुराव
हर जगह ।
मन होगया है
गर्मियों वाले नाले की तरह ।
कद-काठी से छोटे दुशाले की तरह ।
अब समझ में आया है कि
हमारे आसपास क्यों है इतनी अशान्ति
श्रान्ति और क्लान्ति
और कि,
क्यों तुम्हें
अतुलनीय कहा जाता है माँ ।

Monday, April 25, 2011

दो लघु कथाएं

(1)
गन्दगी
-------------
ए......ए,ए मौडा ,यहाँ नही । आगे ले जा ।
एक चौदह-पन्द्रह साल का लडका किसी चेम्बर का मलबा कनस्तरों में भर कर नाली में बहाने के लिये ले जा रहा था कि खिडकी में बैठी औरत चिल्लाई । उसकी आवाज सुन कर एक दो लोग और आगए । उनमें मोहल्लावासी होने का दायित्त्व जागा । इस एक एक करके उसे टोकने लगे ।
क्यों रे सुना नही , कहाँ से ला रहा है भर--भर कर । इधर क्या आदमी नही रहते जो गन्दगी को इधर बहाने ले आया ।
भाई साब मैं तो आगे ही .....। लडका अपनी सफाई में कुछ कहता तभी दूसरा आदमी आगया ।
ओय , इधर क्या जानवर रहते हैं ..हें..। गरीबों का मोहल्ला है तो हर कोई फालतू ही समझ लेता है । होंगे,, भी.आई.पी. तो अपने घर के होंगे।
अरे यार ये लोग भी तो ऐसे ही होते हैं । पूरे जूताखोर । रौब के मारे चलते हैं और हम जैसों को आँखें दिखाते हैं। कोई उठवा तो ले इनसे एक पत्ता भी ...।
इतने सारे लोगों के तीखे तेवर देख कर लडका सहम गया । उनकी बातों से कुछ आहत भी हुआ । तिलमिला कर बोला ---आप बेकार ही क्यों चिल्ला रहे हैं । मैने गन्दगी को यहाँ बहा तो नही दिया ।
अच्छा ...---एक आदमी दबंग की तरह बाँहें चढाता हुआ बोला---यहाँ कनस्तरों को खाली कर देता तब कहते तुझसे । हें ।
अगर नही टोकते तो साफ बहा ही दिया होता कि नही ...। दूसरा आदमी आगया ।
हेकडी तो देखो लौंडे की---बहा तो नही दिया ---अभी दो हाथ पड गए तो सारी अकड भूल जाएगा ।
ऐसे कैसे पड जाएंगे हाथ । गन्दगी को क्या हम अपने घर ले जाएं...। लडके का आत्मसम्मान जागा ।
तो फिर आ ...आज तेरी हेकडी को मैं निकालूँ ।--एक और आदमी मूँछों पर हाथ फेरता हुआ बढा ही था कि लडका दोनों कनस्तरों को वही पटक कर भाग लिया ।
वहाँ इकट्ठे हुए लोगों ने एक विजयी ठहाका लगाया ।
ससुरा ... भाग गया । नही तो उसे बताते कि इस मोहल्ले में कोई ऐरे--गैरे लोग नही रहते । अब कभी हिम्मत नही करेगा भूल कर भी..।
अरे , वो तो मेरी नजर पड गई वरना वो तो यही बहाने वाला था ।---वह औरत ,जो सबसे पहले चिल्लाई थी , बोली ।
और नही तो क्या बहन जी ..आपने अच्छा किया ।हम लोग एक मोहल्ले में रहते हैं तो हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि सफाई का ध्यान रखें ।
सभी बडे सौहार्द्र के साथ अपनी सूझबूझ और जिम्मेदारी का बखान कर रहे थे । तभी गन्दी बदबू ने उन्हें अहसास कराया कि न केवल कनस्तर वही लुढके पडे हैं बल्कि उनसे गन्दगी भी बह कर फैल रही है ।
अरे,....कमबख्त यही पटक गया ..। कहते हुए सबने अपनी-अपनी नाक पर रूमाल रख लिया ।
इससे तो अच्छा था कि वह नाली में ही बहा जाता । ---एक ने बगल में थूकते हुए कहा ।
अब क्या होगा भाई----दूसरा वहाँ से काफी दूर जाकर बोला ।
होगा क्या , जमादार को खबर कर देते हैं । यह कह एक--एक कर सभी अपने घरों में बन्द हो गए ।
कनस्तरों से निकल कर बदबू छोडती हुई गन्दगी लगातार गली में बह रही थी ।
------------------------------
(2)
स्वराज
--------
वीरू भाई, नल में टोंटी लगवा लो । पानी बेकार ही बह रहा है । ---श्रीवास्तव जी अपने पडौसी को समझा रहे थे ।
सब जानते हैं कि कुछ ही दिन पहले इस मोहल्ले के लोग किस तरह बाल्टी भर पानी के लिये सडक, चौराहे तक भटकते थे । कटोरी भर पानी भी फालतू नही फेंकते थे ।
आखिर एक दिन तंग आकर लोग इकट्ठे होकर महापौर के दफ्तर पहुँच गए । जमकर नारे बाजी की और विरोधी पार्टी के एक कार्यकर्ता ने दमदार भाषण भी दिया---
अँग्रेजी शासन में जब जनता पिसी तो हमारे वीरों ने कुर्बानियाँ देकर उन्हें भगाया और स्वराज स्थापित किया पर पर आजादी के बासठ साल बाद भी हमारी सरकार हमें पानी तक उपलब्ध नही करा सकी है । एक-एक बूँद पानी के लिये लोग पूरे दिन संघर्ष करते हैं। नही चाहिये ऐसे नेता ,ऐसे प्रशासक । महापौर हाय..हाय..।
महापौर को अपनी कुर्सी डोलती नजर आई सो तुरन्त इस मोहल्ले के लिये अलग बोरिंग की व्यवस्था करदी । अब पानी का कोई संकट नही है । एक-दो घण्टे जितना चाहे पानी लो ।
भले ही हमें भरपूर पानी मिल रहा है भाई ,लेकिन इसे व्यर्थ नही बहाना चाहिये पानी की एक--एक बूँद कीमती होती है ।--- श्रीवास्तव जी वीरेन्द्र को यही समझा रहे थे ।
अरे भाई साब काहे फालतू की टेंसन में दुबला रहे हो ।--वीरू ने ढिठाई से हँसते हुए कहा ----
पानी कौनसा तुम्हारे घर से जा रहा है ।
घर से तो न मेरे जारहा न तुम्हारे । लेकिन मेरे भाई जल के भण्डार की भी सीमा होती है ।
तो ठीक है न । खतम होजाएगा तो.......बस जरा सा हंगामा करने की जरूरत है सरकार फिर कोई इन्तजाम करेगी ।
श्रीवास्तव जी के पास अब वीरू को समझाने के लिये कुछ भी नही था । पानी नाली में बहे जा रहा था ।

Friday, April 15, 2011

विवेक के जीवन में विहान


9 अप्रेल 2011 , सर गंगाराम अस्पताल दिल्ली ,समय --दोपहर 12 .07
निहाशा और विवेक एक पुत्र (विहान )के माता-पिता बन गए । मैं विमुग्ध थी कि नन्हा शिशु ,जो आँखें भी नही खोल पारहा था अपनी नन्ही उँगलियों को मुँह में देने की कोशिश करता हुआ आसपास कैसा नरम सा उजाला फैला रहा था । एकदम सुबह की कोमल धूप सा । प्रभाती सूरज के रूप सा । उसकी गुलाबी कोमल हथेलियों को छूते हुए मुझे अपने चारों ओर बेशुमार गुलाब खिलते हुए महसूस हुए । एक जीवन की यह अद्भुत सुबह .. ह्रदय के क्षितिज पर एक नया विहान ।


प्रियजन,
कुछ सुधी पाठकों की प्रतिक्रिया आई कि कस्बा व महानगर की तुलना कुछ तिक्त होगई है । हालाँकि मुझे तो ऐसा नही लगा किन्तु अगर उन्हें ऐसा महसूस हुआ है तो उसमें सत्यता होगी ही । आंशिक ही सही । उनकी राय का सम्मान करते हुए मैं वे अंश निकाल रही हूँ ।

Saturday, April 2, 2011

उन दिनों



यह बात उन दिनों की है ,
जब हमारे आँगन में
खुशियाँ महकतीं थीं
नीम और सरसों के फूलों में ही
और ठण्डक देती थी
बबूल की छाँव भी ।
पाँव नही थकते थे
मीलों चलते हुए भी
भरी दुपहरी में ।
बिताते थे हम अँधेरी रातों को
बिना किसी शिकायत के
गीतों के दीप जलाकर
प्रतीक्षा करते हुए उजाले पाख की ।
और चाँदनी सचमुच उतर आती थी
हमारी आँखों में ,निर्बाध.....
और बुनती थी छप्पर के तिनकों में ही
रुपहले रेशमी सपने ।
ऊँची नहीं होतीं थी
माटी की दीवारें ,
झाँक सकते थे पडौस के आँगन में
पंजों के बल खडे होकर
देखने ,कि सब्जी क्या बन रही है ।
या कि किस बात पर आपस में ठन रही है ।
कहीं किसी दुराव की जरूरत नही थी ।
बिना दस्तक दिये ,बिना पूछे ही
आँगन में ,आकर बैठ जाता था
पूरा आसमान,
बेझिझक पाँव पसार ।
नदी की राह में नही थी कोई खाई या दीवार
जरा सी आहट पर झट् से खुल जाते थे द्वार
यह उन दिनों की बात है
जब हर बार कुछ नया पेश करने की सूरत नही थी
मन बहलाने किसी साधन की जरूरत नही थी
खाली नही था मन को कोई कोना
मुट्ठी में था खुशी का होना न होना ।
क्योंकि तब हमारे बीच शहर नही था ।
शहर --जो अपनी असभ्यता व पिछडेपन से उबरने
खुद हमने ही बसाया ।
अपने आसपास ।
अब ,हम सभ्य हैं
प्रगतिशील हैं
हमारे आसपास चमक-दमक है
सुविधाएं हैं और सोने--चाँदी की खनक है
एक भरा-पूरा शहर आ बसा है हमारे बीच..।
और हम ढूँढ रहे हैं , अपनी खोई हुई
एक ठहाके वाली हँसी
किसी भीड भरे बाजार में ।

Monday, March 21, 2011

कैसी होली , कैसा फाग


आप सबको होली की बहुत--बहुत बधाई ।
इस बार हमारे शहर में तो होली बडी फीकी-फीकी सी रही । न रंग--गुलाल से सजे बाजार, न उमंग भरे छींटे न ही मस्ती भरी बौछारें । सुबह-सुबह रोज नीम की सूनी होती टहनियों में ही बैठ कर कोयल भले ही कुहू-कुहू की टेर लगाती रही कि होली आने वाली है और कहीं भूले-भटके से रह गये कचनार की गुलाबी-जामनी फूलों लदीं टहनियाँ भले ही मन में एक अनकही सी वेदना के साथ-साथ उमंगों की हिलोरें जगाने के जी-तोड प्रयास करती रही , स्कूल में विद्यार्थी भले ही बॅालपेन से अपने साथियों की शर्ट पर लकीरें खींच कर मासूम से विवाद सामने लाते हुए याद दिलाते रहे कि होली आ ही गई है ।
लेकिन होली आई कहाँ ..।

रिश्तों में दिनोंदिन आती दूरियों , मोल-तोल और व्यापार-बुद्धि के चलते जीवन के रंग तो वैसे ही फीके होरहे हैं ,उस पर आजकल शहर के सौंन्दर्यीकरण के लिये , सडकों के चौडीकरण के लिये निर्ममता से मकान गिराए जारहे हैं ,दुकानें तोडी जारहीं हैं । सरकारी आदेश है कि सन् 1940 के नक्शे के आधार पर बने मकानों को ही वैध मान कर अतिक्रमण को हटाया जाय और सडकों का चौडीकरण किया जाय । गनीमत है कि मकानों को ही अवैध माना गया है जनसंख्या को नही वरना क्या होता । लोगों ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर हाय-तोबा मचाई पर न्यायालय का सख्त आदेश के चलते अब लोग खुद ही अपने मकानों को तोड रहे हैं । वरना थ्रीडी मशीन किसी आतंकी हमलावर की तरह पल भर में इमारतों को धराशायी करने तैयार बैठी है । इस तोड-फोड में सडक ही नही , गली-मोहल्ला ही नही , या कि घर-आँगन ही नही, तन मन भी जैसे मलबे से पट गए हैं सारे रंग धूसर से हो गए हैं । होली मनाने की औपचारिकता के लिये जहाँ भी चार लोग जुड रहे हैं लौट--फिर कर तोड-फोड के मुद्दे पर आजाते हैं कि जब मकान बन रहे थे तब क्या निगम वाले सो रहे थे । कि आदमी कैसे--कैसे अपने लिये घर बनाता है । गरीब आदमी का तो मरना हो ही गया पर धन्धा चौपट होने से व्यापारियों का भी कम नुक्सान नही हुआ । देखना इस बार यह सरकार तो गिरेगी । मुख्य-मार्ग वाले घरों में गृहणियाँ गुझिया-मठरी बनाने की बजाय घर में बैठने की जगह बनाने की उलझन में उलझी रहीं । हर कोई कबीर के दोहे -माली आवत देख कर... में ,काल हमारी बार, की आशंका से त्रस्त हैं । जिस तरह लोगों ने इस बार होली मनाई है, मैंने भी बडी कोशिशों के बाद कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं बिखरे मकानों की तरह ही । पढ कर आप यदि मुझे कोसने लगें ,जैसे लोग नगर-निगम वालों को कोस रहे हैं, तो कोई अचम्भा नही ।
(1)
हे प्रिय ,
जिस तरह अतिक्रमण का आरोप लगा कर
जब देखो , तुम तोडते रहते हो
निर्ममता से हमारा मन
उसी तरह आजकल थ्रीडी मशीन ,
ताबडतोड तोडे जारही है
सडक वाले भवन ।
तुम्हारी तरह ही
वह नही सुनती किसी का हाहाकार
पल भर में ध्वस्त करती दरो-दीवार
उडाती गर्द-गुबार ।
जापान में तो मकान भूकम्प ने गिराए
सुनामी ने बहाए ।
बेवशी थी उस कहर को सहना ।
पर यहाँ तो मुश्किल हुआ रहना
अपने ही हाथों ,अपने घर
खुद ही गिराए जारहे हैं
शहर को सुन्दर बनाने के 
सपने दिखाए जारहे हैं ।
बताओ तो कि ,
पलकों के नीचे बसतीं रहीं बस्तियाँ
तब कहाँ थीं ये हस्तियाँ ।
मैं तो हूँ तोड-फोड से त्रस्त
सामान समेटने में व्यस्त
तुम्हारे इस तर्क को समझने में 
मुझे अभी लगेगा वक्त
कि जरूरी होता है ,विध्वंस
नये निर्माण के लिये..।
(2)
चारों ओर लगी है आग
कैसी होली , कैसा फाग ।

रिश्तों में जंजीर नही है
काँटा तो है पीर नही है
जहाँ भी देखो, जिसे भी देखो
हंगामा और भागमभाग ।
कैसी होली कैसा फाग ।

अतिक्रमण की भेंट चढे हैं
टूटे बिखरे भवन पडे हैं

किसना का मकान कहाँ है
बिसना की दुकान कहाँ है
ईंट-पत्थरों की ढेरी में
रंग भरे अरमान कहाँ हैं ।

रस्ते में कचनार खडा था ।
गुलमोहर का पेड अडा था
पिछले साल आम की टहनी
गुच्छ-गुच्छे बौर जडा था ।

काट गिराए सडक बनाने ।
कोलतार बेधडक बिछाने ।
चेहरे की रंगत सब देखें ,
देखे कोई न दिल के दाग
कैसी होली कैसा फाग ।

आस नही विश्वास नही है
फिर भी कहें विकास यही है ।
टुकडा भर ही हिस्से में है
कहने को आकाश वही है ।

मोल-तोल और लेन-देन में
हुआ बेसुरा राग-विहाग
कैसी होली कैसा फाग ।
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Monday, March 7, 2011

महिला--दिवस पर दो कविताएं

(1)
तुमने तो कहा था ...
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सस्मित स्वीकारोक्ति भरे
तुम्हारे दो शब्दों को ही नाव बना कर
मैंने तो पार कर लिया
विशाल सागर भी ।

लम्बी निर्जन खामोशी के बीच
सुनती रही तुम्हारी आवाज
अचानक आए
प्रतीक्षित कॅाल की तरह

पढती रही तुम्हारे अक्षरों को
जैसे पढता है कोई ,
अपनी पहली बार छपी कविता को ।

सहेज कर रखी तुम्हारी प्रतीक्षा
जैसे सहेज कर रखता है कोई सन्दूक में
अपने एकमात्र कपडों के जोडे को ।

फिर भी तो
तुम्हारे लिये
मेरा अर्थ रहा
सिर्फ एक देह होना
एक भावविहीन देह ।
परखते रहे हमेशा
जैसे उलट-पलट कर
मोलभाव कर परखता है कोई
फल--सब्जी ।
कसौटी पर खरी न पाकर
उतार दिया मुझे दीवार से
गुजरे साल के कैलेण्डर की तरह ।
पर ...
तुमने तो कहा था कि,
तुम मुझसे प्रेम करते हो ।
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(2)
लिखो तुम
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बेमन ही लिखते रहे तुम
असंगत वाक्य
अर्थहीन खुरदरी भाषा
ऊबड-खाबड शब्द
और फिर झुँझला कर
काटते रहे ।
अब मत करो
मेरा उपयोग
यूँ रफ कापी की तरह ।
देखो मेरा हर पृष्ठ
साफ है ,उपयोगी है ।
लिख सकते हो तुम
ह्रदय के गीत ।
खूबसूरत रेखाचित्र ।
बेशुमार यादगार पलों का
हिसाब किताब
उलझे सवालों के
सुलझे जबाब ।
अंकित करो उन पर
गहरे अहसास
विश्वास की धरती
और उम्मीदों का आकाश
पढे जिसे समय
भर कर विश्वास ।

Tuesday, February 15, 2011

बन्धन

वसन्ती ने आँगन में पडी खाट पर पसरे रामधन को देखा तो लगा जैसे किसी ने छाती में दहकता कोयला दाग दिया हो । नस-नस में खून जैसे धुँआ बन कर उड चला हो । जी में आया कि धक्का देकर दरवाजे से बाहर करदे ।
अब कौनसा नाता निभाने चला आता है यहाँ ...ऐसा ही निभाने वाला होता तो क्या ,दूसरी , रखता ।मैं कोई बाँझ थी कि बिगडी थी ।..हजार बार तो कह दिया कि अब उसी से निभा । बेकार ही हमारा खून मत जला । समझ ले कि हम तेरे लिये मर गये और तू हमारे लिये ..। -----ताव से भरी वसन्ती ने बडबडाते हुए घास का गट्ठर बाहर ही पटक दिया और दनदनाती हुई भीतर गई ।बूढी साबो बहुत दिनों बाद बेटे को देख कुछ पल के लिये सारे ताने-उलाहने भूल गई और हुलसकर पानी का लोटा भर कर ला रही थी कि वसन्ती ने लोटा छीन कर एक तरफ रख दिया और सास पर बरस पडी---
लाड बाद में दिखाती रहना अम्मा ।..पहले इससे पूछ कि क्यों आया है यहाँ । हमारा खून जलाए बिना जी नही भरता इसका ।सब कुछ भूल कर अपने बच्चों को पाल रही हूँ तो अब यह भी नही सुहाता इसे ।...और तेरा जी पिराता है तो तू भी चली जा अपने लाडले के साथ । मर नही जाऊँगी अकेली । ..नही तो साफ कहदे कि यहाँ अपनी सूरत दिखाने न आया करे नही तो ...।
अरे बेटी----साबो गहरी साँस भरते हुए बोली---सात फेरों का बन्धन तो मरे छूटता है ।
छूटता होगा ---वसन्ती तिलमिला कर बोली---इससे मेरा तो अब कोई नाता नही है । मरेगा तब भी आँसू न निकलेंगे मेरे ..। कहते--कहते उसकी आवाज भर्रा गई ।गले की नसें फूल ईं । और पनियाई सी आँखें सुर्ख होगईँ ।
चोट खाई सी साबो चुपचाप खटिया में जा धँसी । वसन्ती का एक-एक शब्द कलेजे पर हथौडे की तरह पड रहा था । शायद रामधन ने कुछ सुना नही । महाभारत होजाता । पर वह वसन्ती से भी क्या कहे । कैसे कहे ।अच्छी भली बहू को छोड कर ,निमौना ,से दो बच्चों को बिसरा कर रामू ने जो किया वह क्या छिमा करने लायक है । छिनालें जाने क्या पट्टी पढा देतीं हैं कि आदमी अपना घर-बार ,बद-बदनामी सब भूल उनके जाल में जा फँसता है । रामधन के दूसरा घर बसा लेने के बाद साबो ही जानती है कि कैसे उसने वसन्ती को सम्हाला है । और कैसे न सम्हालती । अबोध वसन्ती इसी आँगन में जवान हुई । माँ बनी । उस संकट में भी वह मायके नही गई । और साबो के अलावा उसका है ही कौन । हुलक-हुलक कर रोती वसन्ती को छाती से लगा कर साबो ने जाने कितनी रातें गुजारी हैं । उसकी बात का बुरा माने भी तो कैसे । और वह गलत भी तो नही कहती --यह घर है कोई रंडी का कोठा नही कि जब मन हुआ ,चले आए जी बहलाने ।...ऐसे कपूत से तो वह निपूती ही भली थी साबो ।
अम्मा ..ओ अम्मा तू ऐसी कठोर होगई है कि...। रामधन ने घर में सन्नाटा पाकर हाँक लगाई । साबो के मन में हूक सी तो उठी पर बहू के गुस्से का ख्याल कर चुप्पी साध गई ।
घर में और कोई नही है क्या । गुड्डू ..राजू ...प्यास के मारे कंठ सूख रहा है । कोई पानी देने वाला भी नही रहा क्या ।--रामधन जोर से चिल्लाया तो वसन्ती से न रहा गया । लोटा में पानी लाते हुए बोली--
क्यों चिल्ला रहे हो गला फाड कर । बहरे नही हैं हमलोग..।
वसन्ती कहना तो चाहती थी कि इधर कैसे चले आए । क्या चहेती से खटपट होगई । पर उसकी नजर रामधन की चढी सी आँखों पर गई और धीरे-धीरे निकलती कराह सुनी तो पास आई और माथा छूकर देखा । फिर ठहरी हुई सी आवाज में बोली---हूँ...जोर का बुखार चढा है । तभी तो मैं कहूँ कि..।
इसके बाद रामधन का कराहना बढ गया और वसन्ती का बडबडाना---अपना तो होस ही नही है इस आदमी को । कभी बुखार कभी हैजा तो कभी पेट का दरद । मनमानी तो करली अब ढंग से रहा भी नही जाता । हम भी तो रहते हैं कि नही ।
फिर वह योंही बडबडाती हुई रामधन के लिये कम्बल लाई । दूध गरम करके पिलाया । कम्बल ओढाया ।और पास बैठ कर माथा दबाने लगी । न कोई ताव न झल्लाहट ।
यह सब देख खाट में गुडमुड सी पडी साबो की आँतों में ऐंठन सी हुई ।और आँखों के छोरों से परनाला भरभरा कर बह चला । पता नही वे आँसू खुशी के थे या पीडा के ।

Thursday, February 10, 2011

दो कविताएं प्रेम की

यादें
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(1)
कुछ यादें,
सुपरफास्ट ट्रेन की तरह
गुजरती रहतीं हैं अक्सर
ह्रदय के पुल से।
धडधडाती हुई,
चप्पा--चप्पा थर्राती हुई
उडाती हुई--धूल, पत्ते, ...तिनके ।
उतर नही पाती जिन्दगी ,
किसी भी स्टेशन पर
चाह कर भी ।
(2)
नियमित धारावाहिकों सी
कुछ यादें
करतीं हैं षडयन्त्र ।
रूबरू नही होने देतीं मुझे
अपने-आप से ।
सोच भी नही पाती ,
अपनी पीडाओं और अभावों को
अपनों के पराएपन को,
छल और दुरावों को
गहराई से ।
(3)
उतर आती है पूरब के क्षितिज से
यादों की धूप
मुग्ध , चकित झाँकती है
कमरे में ।
मेरे दिखाती है मुझे
मेज पर जमी धूल
गुलदस्ते के सूखे फूल
पलटतीं हैं मेरी डायरी के
एक अरसे से कोरे रह गए पन्ने
और यूँ करतीं हैं मुझे
और भी उदास ..तन्हा...।
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(2)उनका आना

खयालों में उनका आना
फूटना है कोंपलों का
ठूँठ शाखों पर
पतझड के बाद ।

दस्तक देना है
पोस्टमैन का
भरी दुपहरी में
थमा जाना
एक खूबसूरत लिफाफा ।

मिलजाना है
रख कर भूला हुआ कोई नोट
किताबें पलटते हुए
अचानक ही ।

लौट आना है
एक गुमशुदा बच्चे का
अपने घर
बहुत दिनों बाद ।

मिल जाना है
अचानक ही
किसी अनजान शहर में
बचपन के सहपाठी का ।

और दिमाग में भरी हो
खीज और झुँझलाहट
ऐसे में एक मासूम
दुधमुँही मुस्कराहट का
समाजाना आँखों में ।
यूँ उनका आना खयालों में

कोई जरूरी चीज भूल गये
आदमी की तरह
लौट पडना जिन्दगी का
उल्टे पाँव घर
या
मिलना एक सान्त्वना
अपनत्व और दुलार भरी
चोट से आहत
रोते हुए बच्चे को
या फिर
गुलमोहर के झुरमुट से
कूक उठना कोयल का
कॅालोनी की उबाऊ खामोशी के बीच
किसी दोपहर अचानक ही
यूँ उनका आना खयालों में

सन् 1998 में प्रकाशित व पुरस्कृत