Tuesday, December 24, 2013

रसानुभूति किसे होती है ?

विभाग ने पहली बार हिन्दी-प्रशिक्षण का कार्यक्रम बनाकर ( देर से ही सही ) हिन्दी के प्रति अपनी जागरूकता का परिचय दिया । वास्तव में देखा जाए तो हिन्दी के प्रशिक्षण और शिक्षण-सुधार की सर्वाधिक आवश्यकता है । हिन्दी के प्रति शासन ,शिक्षक और इसलिये छात्रों में भी ,जो उपेक्षा व उदासीनता का भाव देखा जा रहा है वह शिक्षा की गुणवत्ता में उत्तरोत्तर गिरावट का संकेत है । क्योंकि हिन्दी महज विषय नही एक ठोस जमीन है जिसपर शिक्षा का भवन मजबूती से खडा हो सकता है । हिन्दी सही है तो हर विषय सही है । हिन्दी माध्यम में तो यह अपरिहार्य है ही अँग्रेजी में भी जरूरी है क्योंकि पढें चाहे जिस माध्यम से पर हमारी मातृभाषा तो हिन्दी ही है ।
लेकिन प्रशिक्षण का उद्देश्य अच्छे परीक्षा-परिणाम हेतु छात्रों की तैयारी कराना था । अगर मैं अपनी बात कहूँ तो परीक्षा की दृष्टि से पढाने का विचार ही सही नही है क्योंकि इससे छात्र का ध्यान केवल परीक्षा पर रहता है । वह विस्तार से पढना ही नही चाहता । 
यही कारण है कि अध्यापन में कुछ नया पढने व खोजने की बात तो दूर ,हमारा पढा हुआ भी विस्मृत होता जारहा है । 
हाल यह है कि सारे विषयों में छात्र की खींचतान होती रहती है । उन्हें किसी तरह परीक्षा में पास कराने की जुगाड में स्कूल ही नही पूरा विभाग लगा रहता है । शिवलाल ,युगबोध ,प्रबोध,केशव ,ज्ञानालोक जैसे प्रकाशनों की सीरीज शाहरुख सलमान की फिल्मों की तरह व्यवसाय करतीं हैं, क्योंकि वे पूरा पेपर 'फँसने' की 'फुल गारन्टी ' देते हैं । ( क्यों देते हैं यह भी अन्वेषण का विषय हो सकता है )  
अब जिन्हें ठीक से हिन्दी पढनी व लिखनी नही आती ---( कामर्स की क्लास में 80 प्रतिशत और विज्ञान की कक्षाओं में 50 प्रतिशत ऐसे ही विद्यार्थी है )---उनके लिये व्यंग्यार्थ ,भावार्थ, भाव-विस्तार ,रस निष्पत्ति, अलंकार वाक्य-विश्लेषण आदि पढाने की बात ही कहाँ आ पाती है ! ऐसे में , अगर विभाग परीक्षा की तैयारी करवाने की विधि भी सिखाने वाला है तो यह भी एक बडा पाठ होगा हमारे लिये । इसलिये मन में विद्यार्थी बनकर सीखने का उल्लास था ।
विभाग के ही एक भवन में शिक्षक/व्याख्याताओं के ठहरने की व्यवस्था, खानपान और सोने का प्रबन्ध हमें यह अनुभव करा रहा था कि यहाँ हम कुछ खास हैं जो कुछ खास सीखने के लिये आए हैं । (हालांकि ऐसे विचार हम जैसे कुछ 'टुटपुँजिया 'लोगों के ही थे जो हर तरह की व्यवस्था में अपना काम चला लेते हैं ,यहाँ तो फिर भी ठीक ही था ) वरना हमारी कई साथी व्याख्याता व्यवस्था को घटिया बताते हुए खाना खाकर रात अपने रिश्तेदारों के यहाँ चली जातीं थीं ) खैर ,बात सीधी कक्षाओं की करें क्योंकि कम से कम मेरा ध्यान वहीं था । 
पहली बात तो यह कि यहाँ भी बहुत ही जाने माने स्कूलों की तरह गजब की समय पाबन्दी थी । घडी का काँटा देखकर कथित विद्वजन कक्षा में आते और जाते थे । यह बात अलग है कि प्रतिदिन पाँच कालखण्डों में जो पढाया गया ,अधिकांशतः ऐसा कुछ नही था जो नया , उपयोगी या उल्लेखनीय हो । उसका न उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम से कोई सम्बन्ध था न ही परीक्षा की तैयारी से । जैसे बल्लभ सम्प्रदाय के सिद्धान्त । खडीबोली ( भाषा को बोली बताया ),शौरसेनी प्राकृत अपभ्रंश मागधी आदि बोलियाँ कैसे विकसित हुईं और कहाँ बोली जातीं हैं । शैव और वैष्णव सम्प्रदायों में मतभेद क्यों थे । एक मैडम ने कबीर काव्य पर शोध-प्रबन्ध लिखा है । वे अपने पीरियड में धाराप्रवाह कबीर के पद और दोहे सुनाती रहीं और बेहद मधुर वाक्चातुर्य द्वारा उनके दर्शन का प्रदर्शन करती रही पर काव्य की व्याख्या एक बार भी नही की । या फिर ऐसे विषय लिये गए जो बहुत ही सामान्य और आम हैं जैसे वाक्यों के भेद अर्थगत् और रचनागत् । अलंकार --शब्दालंकार अर्थालंकार क्या हैं । विराम-चिह्न , द्विवेदीयुग, छायावाद आदि कालों के प्रमुख कवि....।   
पर सबसे उल्लेखनीय रहा रस सिद्धान्त का पाठ ।इसे पढकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि उच्च स्तर के माने गए उन विद्वानों-विदुषियों का अध्यापन किस स्तर का होसकता है । 
"आहा...रस तो काव्य काव्य की आत्मा है रसात्मकं वाक्यं काव्यं ।"--एक सुदर्शिनी, मधुरभाषिणी प्राध्यापिका चुस्ती-फुर्ती के साथ मुस्कराती आई । उन्होंने आते ही शास्त्र सम्म्त कुछ सिद्धान्तों का व्याख्यान दिया । उनके अधिकार पूर्ण लहजे से हमें आश्वस्ति हुई कि ये कुछ नया जरूर बताएंगी । 
"अच्छा बताइये रस के कितने अंग होते हैं ?"
"मैडम चार अंग होते हैं --स्थायी-भाव ,विभाव अनुभाव और संचारी भाव ।"--एक व्याख्याता ने किसी छात्र की तरह खडे होकर कहा ।
"बहुत बढिया । अब आपको बताती हूँ कि रस निष्पत्ति कैसे होती है । विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः । यानी कि भावों का विभाव अनुभाव और संचारी भावों से संयोग ही रस निष्पत्ति कहा जाता है ।"
"मैडम इसी को रस--परिपाक भी कहते हैं ?"
"वो अलग बात है उसे बाद में बताऊँगी पहले एक विषय समझलें ।--उस जिज्ञासु विद्यार्थी को शान्त करते हुए बोलीं -- देखिये कुछ भी समझने के लिये जरूरी है आप ध्यान एकाग्र रखें । आपने सुना तो होगा श्वान निद्रा..."
"मैडम आप आगे बताइये "---एक ने आशंकित होकर कहा क्योंकि मैडम में उपदेश देने की अपार क्षमता और ज्ञान है यह अनुमान पहले ही होगया था ।
"हाँ  हाँ , तो पहले विभाव आता है उसके दो प्रकार होते है-आलम्बन और उद्दीपन । जब आलम्बन के भाव जाग्रत होते हैं तो ...।"
"मैडम कौनसे भाव । अनुभाव या स्थायीभाव ?"
"अभी स्थायीभाव कहाँ से आगए ? मैडम कुछ असन्तोष के साथ बोलीं ---"मैं अभी वहाँ आरही हूँ । आप धैर्य तो रखिये । हाँ तो मैं बता रही थी कि आलम्बन में आश्रय के मन में भाव जागे जो उद्दीपन से पुष्ट हुए । फिर आया अनुभाव । ये आश्रय की शारीरिक चेष्टाएं होते हैं । जब ये तीनों मिलकर संचारी भावों से मिलते हैं तो रसनिष्पत्ति होती है ।"
"लेकिन मैडम स्थायीभाव कहाँ रहे ?"  मुझसे न रहा गया ।
"अरे मैंने बताया न कि वे आश्रय के मन में थे ।" 
"तो फिर रस की अनुभूति किसे होगी ?"
"आश्रय को और किसको !"--उन्होंने मेरे अल्पज्ञान पर तरस खाते हुए कहा---" बडी साधारण सी बात है । रस की अनुभूति किसे नही होती ! रस है क्या ? रस माने आनन्द । सोचिये रस कहाँ नही है ! हममें, आपमें, बच्चों में ,प्रकृति में हर जगह रस है । जीवन में रस न हो ,भोजन में रस न हो तो क्या होगा ?
मानव मात्र का हदय रसिक होता है । मानवमात्र को रस की अनुभूति होती है । हर व्यक्ति आनन्द का प्रेमी होता है । यही तो रस है ।" 
"लेकिन मैडम परिभाषा तो यह कहती है ,और हमारा अनुभव भी कि रस केवल काव्य में होता है । काव्य को पढते सुनते या देखते समय ,पाठक श्रोता या ..।"
"देखिये"---वह मेरी बात काट कर बोलीं---"परिभाषा परिभाषा की जगह है । पहले छात्र को सामान्य अर्थ में समझाइये कि रस आखिर है क्या । जहाँ कहीँ भी हमें आनन्द मिलता है वहीं रस है । वह सीधे स्थायीभाव ,विभाव को कैसे समझेगा । जब वह आनन्द को समझेगा तभी तो रस को जानेगा ! क्या कोई ऐसा होगा जिसे आनन्द की अनुभूति न होती हो ? नही न ? " 
"हाँ हाँ मैडम सही है सही है । सबने कहा ।
और इस तरह रस-निष्पत्ति सम्पन्न होगई । चाहे स्थायी-भाव पूरी तरह आश्रय के आश्रित होगए । सहृदय डूब मरा समुद्र में । रसानुभूति गई रसातल में और रस-सिद्धान्त कहीं कोने में बैठा लजाता रहा । अब आप ही बताएं कि रसानुभूति किसे होती है ?

Thursday, December 12, 2013

संकल्प एक सास का


एक हैं पुष्पा जीजी । मेरे गाँव की हैं । धन-बल और कुलीन सम्पन्न एक ऐसे परिवार की बेटी जहाँ उनके समय में बहू-बेटियों को बहुत ही निचले दर्जे पर रखा जाता था ( अब तस्वीर कुछ बदली है हालांकि ज्यादा नही )। रूढिवादिता के चलते पुष्पाजीजी शायद पाँचवी पास भी नही कर पाईं कि उनका विवाह होगया । यों विवाह तो मेरा भी बहुत जल्दी कर दिया गया लेकिन तब तक मैंने ग्यारहवीं कक्षा तो पास कर ही ली थी और बाद में इस समझ के साथ कि पढना ही सही अर्थों में कुछ हासिल करना है , स्कूल में बच्चों को पढाते-पढाते खुद भी जैसे तैसे बी ए और फिर एम ए की परीक्षाएं भी पास कर ली लेकिन पुष्पाजीजी परम्परागत बहुओं की तरह अपनी भरी-पूरी ससुराल के प्रति समर्पित होगईं ।
 कुछ साल तक हमारा मेल-मिलाप न के बराबर ही रहा । 
एक साल पहले उनसे जो भेंट हुई तो मिलने का सिलसिला चल निकला । उन्होंने यहीं आनन्दनगर  में भी एक मकान खरीदा है । इसलिये आनाजाना बना रहता है । 
तीन बहुओं की सास और चार पोते-पोतियों की दादी बनने के बावजूद पुष्पाजीजी में तन मन और बोलचाल से कोई खास बदलाव नही है । हाँ अब एक नई चमक है आँखों में । गर्व और पुलक से भरी चमक । मुझे याद है सालभर पहले जब हम मिले थे उन्होंने कहा था--  
"गिरिजा ,हमाई मनीसा कौ गाइवौ तौ सुनिकैं देखियो ।" 
मनीषा ,उनकी बडी बहू । देहात की सीधी सादी लडकी । अब दो बच्चों की माँ । गाती होगी जैसे कि गाँव की दूसरी बहू-बेटियाँ भजन-कीर्तन गातीं हैं । मैंने तब लापरवाही के साथ यही कुछ सोचा इसलिये ज्यादा उत्सुकता नही दिखाई । लेकिन पुष्पाजीजी को बडी उत्सुकता थी । 
जल्दी ही वह अवसर भी मिल गया । कुछ दिनों पहले उनके यहाँ सुन्दरकाण्ड-पाठ का आयोजन था । आयोजन बडा ही सरस और मधुर संगीतमय था । तीन घंटे कब बीत गए पता ही न चला । इसे कहते हैं मानस-पाठ अन्यथा मानस-पाठ के नाम पर लोग कैसे भी गा गाकर पर जो अत्याचार करते हैं वह कम कष्टप्रद नही होता । उसी रात मनीषा ने भी गाया । गाया क्या ,निःशब्द कर दिया कुछ पलों के लिये । क्या वे कोई साधारण भजन थे ? जिनके हमने सिर्फ नाम सुने हैं वे 'यमन ,भैरव ,मधुवन्ती , वृन्दावनी-सारंग, कौशिक आदि रागों की बन्दिशें थीं और आवाज ??..क्या बताऊँ ! मन्द्र के तीसरे काले से तारसप्तक के पाँचवे काले तक ( जैसा कि संगीत के जानकार कहते हैं ) बेरोकटोक चढती उतरती खनकती हुई मीठी आवाज । सधे हुए अभ्यस्त सुर । गाना नही आता तो क्या हुआ ,उसकी परख तो थोडी बहुत है ही । जिस त्वरित गति से वह तानें बोल रही थी आलाप ले रही थी , मैं चकित अपलक देख रही थी । कोई चमत्कार सा था मेरे सामने । 

"पुष्पाजीजी क्या है यह ?" 
"कुछ नही बहन । एक दिन इसे एक 'उस्ताज्जी' ने एसे ही भजन गाते सुन लिया था सो घर आए और बोले कि अगर यह बेटी मेहनत करले तो नाम कमाएगी । साक्षात् सरस्वती बैठी है इसके कण्ठ में । बस मैंने कह दिया कि कि ऐसा है तो घर का काम मैं सम्हालूँगी । मनीषा चाहे जितना समय सीखने में लगाए । अब वे ही इसे सिखा रहे हैं । बच्चों और घर के काम को मैं और छोटी बहू सम्हाल लेती है । 'उस्ताज्जी' कहते हैं कि अगर यह लगन से गाती रही तो बडी बात नही कि एक दिन तानसेन समारोह में गाए । सो बहन मैंने तो सोच लई है कि मुझसे जो बनेगा करूँगी पर मनीषा को उसके लच्छ (लक्ष्य) तक पहुँचाने में पूरी कोसिस करूँगी । "
ग्रामीण अभिजात्य और संकीर्ण परम्परावादी परिवार की अनपढ कही जाने वाली पुष्पाजीजी धर्म और जाति के भेद को ,बहू-बेटा के अन्तर को मिटा कर अपनी बहू को एक कुशल तबलावादक और संगीतज्ञ उस्ताद जी से संगीत शिक्षा दिलवा रही हैं । 
पुष्पाजीजी , तुम्हें अनपढ कहने वाले अनपढ हैं । तुम्हारी समझ के आगे हमारी पढाई-लिखाई छोटी पडगई । मनीषा की साधना और तुम्हारा संकल्प जरूर पूरा होगा ।

Wednesday, December 4, 2013

जाने क्यों ?

दिल में वो ज़ज़बात नही हैं जाने क्यों ?
सुधरे कुछ हालात नही हैं जाने क्यों ?
कहते हैं ,कोशिश की थी पूरे दम से, 
तीन ढाक के पात वही हैं जाने क्यों ?

वो भी दिन थे ,जब पैदल ही जाते थे ।
मुँह बाँधे बस मिर्च-पराँठे खाते थे ।
हर दुकान किस तरह बुलाती थी हमको,
कैसे हर हसरत को रोक दबाते थे ।  
अब पैसा है ,फुरसत है ,सुविधाएं भी हैं 
पर मेले में वो बात नही है जाने क्यों ?

भीग ठिठुरते तलाशते सूखा कोना ।
कीट-केंचुआ गीली लकडी का रोना ।
जहाँ टपकती बूँद , कटोरा रखते थे
कितना मुश्किल सीली कथरी पर सोना ।
पक्का है घर अब , छत बालकनी भी है 
पर वैसी बरसात नही है जाने क्यों ?

है विकास की गूँज शहर और गाँवों में ।
टीवी ,अखबारों ,भाषण ,प्रस्तावों में ।
फैल गया बाजार गली घर आँगन तक ,
हर कोई अब चतुर हुआ है भावों में ।
सुख-सुविधाएं अब पहले से ज्यादा हैं 
चिन्ता का अनुपात वही है जाने क्यों ?


Tuesday, November 26, 2013

एक दिन --दो गीत

आज प्रशान्त (गुल्लू) का जन्मदिन है । मेरे लिये एक अत्यन्त शुभ-दिन दिन । अनेक आशीषों और वरदानों का दिन । पहली रचना उसी के लिये । दूसरी कविता अपने वीर जवानों के लिये जो देश की रक्षा और संकट के समय प्राणों की बाजी लगा देते हैं ।
------------------------------------------------------------------------------------------------------------
(1)
क्या लिखूँ आज तेरे लिये
मेरे प्रथम कोमल गीत 
मेरे वत्स !
मेरे मीत !
अवाक् हूँ
फिसल जाते हैं शब्द
पारे की बूँदों की तरह
मेरी उँगलियों से ।
अव्यक्त है वह अहसास 
,जो होता है 
याद कर तेरी सस्मित आँखों को ।

तेरी आवाज  

धूप की तरह बिखर जाती है 
सुबह-सुबह 
भर देती है उजाला 
घर के कोने-कोने में 
अँधेरे बन्द कमरों में भी ।

साफ कर देती है धूल ।
जो जमी होती है अलमारियों में
सोफा ,शीशा किताबों और डायरियों पर 
रात के अँधेरों में लग गए जाले ,
जो लिपट जाते हैं चेहरे पर, बालों में 
उतार देती है ,
रोज की अभ्यस्त कामवाली की तरह

चाहती हूँ लौटाना तुझे वह सब 

जो दिया है तूने मुझे सबसे पहले  
मिले तुझे वह सब 
जो मेरे मन में है  हमेशा । 
और क्या दूँ तुझे 
मेरे वत्स , मेरे मीत
 मेरे प्रथम कोमल गीत ।


  जन्मदिन--26 नवम्बर 1978
------------------------------------------------------------------------------------------------------------

मुम्बई के आतंकी हमले में काम आए वीरों के सम्मान में----
(2)
मातृ-भूमि का ऋण उतार कर वीर जवान चले 
कर्म भूमि का पथ सँवार कर हो कुर्बान चले ।

दुश्मन ने आतंक मचाया
निर्दोषों का खून बहाया ।
धधक रहीं थीं जब दीवारें 
सहमे प्राण ,देश थर्राया ।
कूद पढे वे तूफां बन कर वीर जवान चले ।
अमर हुए वे जीवन देकर योद्धा थे विरले ।

सिखा गए वे हमको ,चुप रहना ,डर जाना है 
समझौतों पर चलते ही रहना, मर जाना है ।
लगे समझने जब उदारता को कोई कमजोरी 
चोरी करके भी शैतान दिखाए सीनाजोरी 
ईँट लगे तो फेंको पत्थर ,हम सबको इतना समझाकर 
वीर जवान चले ,हो कुर्बान चले ।

छोडो स्वार्थ और समझौते दो जैसे को तैसा । 
सबको समझादो ,यह देश नही है ऐसा वैसा 
स्वार्थ और सत्ता से ऊपर हों अपनी सीमाएं ।
अब गद्दार रहे ना हरगिज अपने दाँए-बाँए । 
बैंगलोर मुम्बई या जयपुर 
रहे न कोई भी यों डरकर  
दुश्मन हाथ मले ,वीर जवान चले ।

किसी शहादत पर भी ना हो कोरी नारेबाजी ।
आन बान का सौदा है यह नही है कोई भाजी ।
दिन में स्वप्न देखने वालों की निंदिया को तोडो ।
आस्तीन के साँपों को अब दूध पिलाना छोडो । 
जीवन का मकसद पूरा कर ,वीर जवान चले ।
यही सबक हम सबको देकर ,हो कुर्बान चले ।

(15 दिस 2008 को रचित) 

Thursday, November 21, 2013

'हेडा-होडा' और बच्चे ।

---------------------------------
बाल-फिल्म महोत्सव के अन्तर्गत विभाग द्वारा स्कूल के बच्चों को कुछ बाल-फिल्में दिखाई गईं । प्राचार्य जी का आदेश हुआ कि हम लोग टाकीज पर ही जाकर केन्द्र के शिक्षकों को टिकिट उपलब्ध कराएं । आदेश कुछ अजीब तो लगा पर आदेश का पालन तो करना ही था । चूँकि उन फिल्मों में मकडी ,या ब्लू-अम्ब्रेला जैसी फिल्में नही थीं बल्कि एकदम अपरिचित से नाम थे इसलिये जहाँ दूसरे शिक्षकों ने फिल्म के प्रति उपेक्षा-भाव रखा वहीं मैंने जिज्ञासावश कि आखिर 'बाल-फिल्म महोत्सव' में बच्चों को कैसी फिल्में दिखाई जातीं हैं, फिल्म देखने का मन बना लिया ।
मुझे जिस टाकीज पर भेजा गया था वहाँ दिखाई जाने वाली फिल्म थी--'हेडा-होडा' ।
स्टाफ के कुछ लोगों ने अनुमान लगाया कि फिल्म शायद किसी होड पर आधारित होगी । होड यानी प्रतिस्पर्धा । मुझे बच्चों की फिल्म (उनकी नजर में स्तरहीन) देखने उत्सुक पाकर कुछ साथी मुस्कराए -- "लीजिये ,मैडम कुछ नही तो बच्चों की फिल्म ही देख रहीं हैं । चलो मुफ्त में दिख जाएगी । क्या बुरा है ।" 
सिनेमा-हाल में छोटे-बडे बच्चों का बेहद शोर था । उनके शिक्षक--शिक्षिका उन्हें हाल में बिठा कर या तो बाहर खडे थे या घर चले गए थे कि फिल्म खत्म होने से पहले आजाएंगे । खैर कुछ देर बाद जैसे ही फिल्म शुरु हुई हाल में शान्ति छागई लेकिन कुछ पलों के लिये ही । इसके बाद जो कुछ फिल्म के अन्त तक होता रहा उसे बताने से पहले हम फिल्म की बात करते हैं । 
यह राजस्थान के एक सीमान्त गाँव 'हेडा' के मासूम और बहादुर बच्चे सोनू पर केन्द्रित कहानी है जो जिज्ञासु और खोजी प्रवृत्ति का है । उसको ऊँट चराने का काम मिला हुआ है । इसलिये नाश्ता करके सुबह ही ऊँटों को लेकर निकल जाता है । उसे अपने ऊँटों से उसे बेहद लगाव है । और ऊँटों को भी उससे । एक दिन उसके तीन ऊँट चोरी होजाते हैं । काफी कोशिशों के बाद सुराग मिलता है कि ऊँट सीमा पार पाकिस्तान ले जाये गए हैं । इससे मामला काफी उलझ जाता है । सोनू बहुत परेशान होता है । उसे पिता की डाँट का नही अपने ऊँटों के खोजाने का गम है । वह चुपचाप उन्हें तलाशता हुआ पाकिस्तान के एक गाँव 'होडा' ( फिल्म का नाम इसलिये हेडा--होडा है ) पहुँच जाता है । हालाँकि होडा गाँव के एक सज्जन (परीक्षित साहनी ) सोनू को स्नेह के साथ सान्त्वना देते हैं और ऊँटों की तलाश में उसकी मदद भी करते हैं । तभी उन्हें पता चलता है कि उनके साले ने ही सोनू के ऊँटों को चुरा कर अपने घर बाँध लिया है । तब वे जैसे-तैसे अपने साले को समझा कर ऊँट लौटाने पर राजी भी कर लेते हैं पर बात जब अफसरों के हाथ में पहुँचती है तो राजनैतिक प्रश्न बन जाती है । कई नियम-कानून रुकावट पैदा करते हैं और लगता है कि अब सोनू को अपने ऊँट शायद ही मिल पाएंगे । वे निराश अपनी सीमा पर बैठे कोई उपाय सोचते हैं तभी उसकी बहन की नजर आसमान में उडते पंछियों पर पडती है । वह सोचती है कि अगर पंछियों के लिये कोई सरहद नहीं है तो ऊँटों के लिये कैसे हो सकती है । फिर क्या वे अपने ऊँटों को उनके नामों से पुकारना शुरु करते हैं। वह दृश्य वाकई बेहद खूबसूरत है जब सोनू के तीनों ऊँट अपने मालिक दोस्त की पुकार सुनकर बापस आते हैं तब कैसी सरहदें और कैसे बँटवारे । सारे अफसर हैरान से ऊँटों को जाते हुए देखते रह जाते हैं । फिल्म रोचक है । सोनू व उसकी बहन का अभिनय जानदार है ।     
          अब बात करें हमारे बाल-दर्शकों की ,तो उन्हें यह बाल फिल्म कोई खास रुचिकर नहीं लगी । सबसे बडा कारण तो यह था कि कलाकार अधिकतर अपरिचित थे । न तो उसमें शाहरुख-आमिर थे न ही कैट-करीना । न गीत न डांस । केन्द्रीय विद्यालय की एक छात्रा कह रही थी --यार बोर होरहे हैं इससे तो अच्छा था कि कहीं पार्टी कर लेते । हाँ शिवाजी साटम को देख कर ,जो सोनू के पिता की भूमिका में हैं, जरूर चिल्लाये --सी आई डी --सीआईडी----।
     इससे पता चलता है कि टीवी चैनलों के कारण बच्चे इतने बडे होगये हैं कि वे बच्चों की चीजें देखना पसन्द नहीं करते । मजेदार बात तो तब हुई जब एक बच्ची ने मेरे मुँह से फिल्म की प्रसंशा सुन कर मुझे पलट कर ऐसे देखा मानो उसे मेरी अक्ल पर सन्देह हो । हाँ गरीब तबके के बच्चों ने जिन्हें टीवी पर सिर्फ राष्ट्रीय चैनल देखना नसीब है फिल्म अवश्य रुचि से देखी । शायद विभाग ने मध्याह्न-भोजन की तरह यह बाल-फिल्मोत्सव का कार्यक्रम भी उन्ही बच्चों के लिये रखा था ।  
  बेशक इसमें बच्चों का नहीं हमारा दोष है। हम एक बार भी नहीं सोच रहे कि बच्चों को क्या देना चाहिये पर क्या दिया जारहा है । बाल-फिल्में दिखाने का यह आयोजन अच्छा है पर साथ ही उन उपायों की भी आवश्यकता है जो किसी तरह बच्चों के बचपन को सुरक्षित रख सकें। 

Monday, November 11, 2013

सुकुमार कल्पनाओं का सलोना संसार

Sushil Shukla's profile photoएक हैं सुशील शुक्ल । वर्त्तमान में  'चकमक 'के सम्पादक । पहले भी बता चुकी हूँ कि चकमक मेरे लिये कई अर्थों में बेहद खास पत्रिका है । पहला तो यही कि इसका रचनात्मक स्वरूप पहले अंक से ही स्तरीय रहा है । दूसरा चकमक से ही पहली बार मेरी किसी रचना का प्रकाशन हुआ । मेरी पहली प्रकाशित रचना थी --'मेरी शाला चिडियाघर है ।' तब चकमक के सम्पादक थे श्री राजेश उत्साही ।  
कहने की आवश्यकता नही कि मेरी बाल-रचनाओं के पीछे चकमक की बडी भूमिका रही है । कुछ कहानियाँ 'अपनी खिडकी से' तथा 'मुझे धूप चाहिये' में आप देख ही चुके हैं । लगभग सत्तर कविताएं और कुछ और कहानियाँ संग्रहीत होने की प्रतीक्षा में है । अभी जून 2013 के अंक में मेरी एक झींगुर वाली कविता है--'मुझको तो गाना है ।
हाँ...तो आजकल चकमक के सम्पादक हैं सुशील शुक्ल । 
ये महाशय शुरुआत के दिनों में चकमक के नन्हे पाठक हुआ करते थे ।लेकिन आज चकमक का आसमान बने हुए हैं ।चाँद--सितारों वाला आसमान । रंगीन पतंगों व गुब्बारों वाला आसमान और चिडियों की चहकार वाला और बादलों की फुहार वाला आसमान । 
सुशील छोटे-बडे सभी पाठकों के लिये अनूठी और प्यारी रचनाएं भी लिखते रहते हैं । मुझे सम्पादक से कही ज्यादा उनके रचनाकार ने प्रभावित किया है । 
स्वाभाव से बहुत ही कोमल और सौम्य लगने वाले सुशील की रचनाएं भी उतनी ही कोमल ,अनूठी और सबसे अलग हैं । उनकी कोमल कल्पनाएं जाने किस स्वप्न-लोक से उतरतीं हैं मासूम अप्सराओं जैसी । पल्लवों से बूँद-बूँद झरती निर्मल-नाजुक ओस जैसी । रेशमी रश्मियों के जाल से छनकर आती चाँदनी की फुहारों जैसी । 
चकमक के अन्तिम (पिछला ) पृष्ठ पर आजकल नियमित रूप से आ रहे हर माह के विवरण को जिसे उन्होंने बचपन की बिल्कुल अछूती ,अनौखी और मासूम नजर से देखते हुए लिखा है ,पढकर मुझे कुछ ऐसा ही महसूस होता है । 
यहाँ जून ,जुलाई और अगस्त के कुछ अंश हैं । बाकी आप चाहें तो चकमक में पढ सकते हैं जो इन्टरनेट पर उपलब्ध है ।
जून--- 'जून दो फाँकों से बना होता ...एक हिस्से में धूप दिखती तो दूसरे में बादल ..। जल्दबाज बादल पहली बारिश से पहले ही छाने चले आते ।.......गर्मियों में सूरज का मछुआरा पानी को बादलों के जाल में फाँसता फिरता । जब बादलों में नदी तालाबों से खूब पानी इकट्ठा होजाता तो...कहीं का कही गिरता । किसी नदी का पानी किसी तालाब में गिरता तो किसी नदी का पानी किसी खेत में ....शायद मछलियों को इसकी पहचान होती हो कि इस बार उनकी नदी में बाजू वाले तालाब का पानी आया है ...कोई पानी बहुत सालों बाद अपने ही ताल में लौटता होगा तब मछलियाँ सारे काम छोड कर उस पानी से किस्से-कहानियाँ सुनने बैठ जाती होंगी ..। पानी उन्हें खेत कुआ, नदियों भैंसों और तमाम परिन्दों की कहानियाँ सुनाता होगा । कोई छोटी मछली जिद करती होगी कि अगली बार वह भी घूमने जाएगी तो पानी उसे पीठ पर बिठा कर कहता होगा --हाँ जरूर चलना ..।'
जुलाई--....'जुलाई में पानी रास्तों से ऊपर बहता चला जाता । रास्ते दिखना बन्द होजाते । कभी लगता कि कहीं रास्ते पानी के साथ बह न गए हों । पानी पर पाँव रखते तो पाँव रास्ते पर ही पडता । हम यह सोचकर खुश होते कि रास्ता अपनी जगह पर ही ठहरा हुआ है ।...अगर रास्ते बह सकते तो सब के सब बह कर हमारी नदी में पहुँच जाते । मछुआरे के जाल में कोई रास्ता फँसा चला आता । मछुआरा उसे फिर वही बिछाने जाता । कभी वह जान बूझकर कहीं का रास्ता कहीं बिछा देता तब किसी के घर के लिये निकला कोई किसी और के घर पहुँच जाता ....स्कूल जाने वाला रास्ता खेल के मैदान वाले रास्ते से बदल जाता । बच्चे स्कूल की जगह खेल के मैदान में पहुँच जाते और मैदान में बच्चों को ढूँढने निकले बडे स्कूल पहुँच जाते ।.'......    
अगस्त---.....'अगस्त में झीलें तालाब भर जाते । ...उनके ऊपर तैरता आसमान होता । जगह--जगह पनप आए छोटे तालाबों में छोटे-छोटे आसमान तैरते मिलते । हम हथेलियों की कटोरी बनाकर उनसे पानी भरते । मेरा दोस्त पानी में तैर रहे आसमान को उठाकर मेरी जेब में डाल देता...जेबें आसमानों से भर जातीं...।
हम नदी में जाते और आसमान को छूकर देखते.....अगस्त में बारिश कुछ को भिगाती और कुछ को सुखाती क्योंकि उनके पास कोई काम न होता वे बेकार बैठे रहते ...।'    
कल्पनाओं की सुकुमारता में सुशील कहीं मुझे पन्त का प्रतिरूप प्रतीत होते हैं तो ऩएपन और अनूठेपन में गुलजार जी का । नीचे सुशील की कुछ बाल कविताएं भी हैं जो इस बात को और भी विश्वसनीय बनातीं हैं ----
(1) पतझड
---------
डाल-डाल से हाथ छुडाकर
पत्ते गदबद भागे ।
पीपल का सबसे पीछे था 
नीम का सबसे आगे ।
सुबह पेड ने देखा जो ,
कुछ पत्ते तो गायब हैं 
गिने चार सौ तेरह कम हैं 
और बाकी तो सब हैं ।
............
कई दिनों सूनी शाखों ने 
चप्पे-चप्पे छाने ।
पत्तों के फोटो चिपकाए 
जाकर थाने थाने 
किए बरामद नीम के पत्ते 
आम के घर पहुँचाए । 
आम की टहनी बोली 
ये साहब किसको ले आए ।

(2)
घर से सिकुडी रात उठाई 
धूल झडा छत पर बिछवाई 
बादल ने पाण्डाल सजाए 
उसमें कुछ तारे टँकवाए ।
हवा ने दो घोडे दौडाए 
ठण्डक पैदल कैसे आए ।
.....
मुझे जरा बडा एक तारा 
अपने सारे कंचे हारा ।
बिस्तर से जब सुबह गिरे थे 
आसपास कंचे बिखरे थे ।
(3)
मेरे घर की छत के काँधे 
सिर रखकर एक आम 
चिडियों से बातें करता है
रोज सुबह और शाम ।
आम के सिर पर एक शहर है 
उसमें एक चिडिया का घर है ।
उसमें  रहते बच्चे दो ।
बस सोए रहते हैं जो ।
कहाँ-कहाँ वे जाएंगे 
जब उनके पर आएंगे ।..।
(4)
नदी बादलों की गुल्लक है 
कि जिसमें बूँदों की चिल्लर पडी है ।
नदी है कि बादलों की लडी है ।
नदी एक बहता हुआ शहर है 
नदी जाने कितनों का घर है
नदी में हम सबकी प्यास रहती है 
नदी में मछलियों की साँस बहती है ।
नदी घडियालों की घडी है 
नदी है कि बादलों की लडी है ।...
(5)
उस दिन धूप बहुत थी 
बादल छाते ताने 
निकल पडे थे 
पहली-पहली बारिश लाने ।
दो झोले पानी के 
टाँगे-टाँगे निकल पडे 
आसमान की सडक थी चिकनी 
दोनों फिसल पडे ।
पानी गिरना था केरल में 
गर गया राजस्थान में 
बुद्धू हो तुम , बादल बोला 
एक ऊँट के कान में ।
(6) 
दोना पत्तल पत्ते की 
दो ना पत्तल पत्ते की 
पत्ती एक एक बित्ते की 
कोई न पूछे कित्ते की ।
बित्ता थोडा बडा है ।
बडा दही में पडा है । 
(7)
किट किट किट किट 
किट किट किट किट 
कीडा बोला घास में 
बोलो एक साँस में 

फर फर फर फर 
फर फर फर फर 
चिडिया उडी आकाश में 
बोलो एक साँस में 

छुक छुक छुक छुक 
छुक छुक छुक छुक
ट्रेन रुकी देवास में 
बोलो एक साँस में ।

Wednesday, November 6, 2013

भैया-दौज----भाई-बहन के अटूट स्नेह की कथा

-----------------------------------------------
भाई दौज की सुबह से ही हमें याद करा दिया जाता था कि दौज की कहानी सुने बिना और भाई को टीका किए बिना पानी भी नही पीना है । जब हम नहा-धोकर तैयार होजातीं तब दादी या नानी तुलसी के चौरा के पास आसन डाल कर ,घी का दिया जलाकर हमारे हाथ में घी-गुड देकर दौज की कहानी शुरु करतीं । कहानी के दौरान कई बार उनका गला भर आता था और कहानी के अन्त में जब वे कहतीं कि जैसा प्रेम उनमें था वैसा भगवान सबमें हो, वे अक्सर पल्लू से आँखें पौंछती मिलतीं थी । बहुत छोटी उम्र में तो हमें नानी--दादी की वह करुणा पल्ले नही पडती थी पर उम्र के साथ कहानी में समाए भाई बहन के स्नेह की तरलता की अनुभूति भिगोती गई । पता नही ये लोककथाएं किसने लिखीं । कैसे लिखीं लेकिन हमारे जीवन से जुडीं हैं । जड की तरह संवेदनाओं का पोषण करती हुई । तभी तो अलिखित होते हुए भी ये पीढी-दर-पीढी हस्तान्तरित होती रहीं हैं । इसे यहाँ देने का उद्देश्य भी यही है ।
हर भाई को हदय से शुभकामनाएं देते हुए उस कहानी को ,जिस रूप में मैंने सुनी है ,यहाँ दे रही हूँ । (यों तो स्थानीय प्रभाव से निश्चित ही थोडा--बहुत अन्तर तो होगा ही )
    
अपनी माँ की आँखों का तारा और बहन का इकलौता दुलारा भाई था 'निकोसी पूत' ( जिसे किसी ने कभी कोसा न हो अभिशाप न दिया हो कहते हैं ऐसे व्यक्ति को बुरी नजर जल्दी लगती है काल भी जैसे उसके लिये तैयार रहता है ) । भाई दौज आई तो वह माँ से बोला --"मैं बहन से टीका कराने जाऊँगा ।" माँ कैसे भेजे । बहुत ही प्यारा और बूढी माँ का इकलौता सहारा । ऊपर से रास्ता बडे खतरों से भरा । 
"बेटा ना जा । बहन परदेश में है । तू अकेला है रस्ता बियाबान है । तेरे बिना मैं कैसे रहूँगी ।"
"जैसे भी रह लेना मैया। बहन मेरी बाट देखती होगी । "
बेटा आखिर चल ही दिया । पर जैसे ही दरवाजे से निकला दरवाजे की ईँटें सरकीं । 
"तुम्हें मुझे दबाना है तो ठीक है पर पहले मैं बहन से टीका तो कराके आजाऊँ फिर मजे में दबा देना..।" निकोसी ने कहा तो दरवाजा मान गया । एक वन पार किया तो शेर मिला । निकोसी को देखते ही झपटा ।
"अरे भैया ठहरो । मेरी बहन टीका की थाली सजाए भूखी बैठी होगी । पहले मैं बहन से टीका करा के लौट आऊँ तब मुझे खा लेना ।" शेर मान गया । आगे बियाबान जंगल के बीच एक नदी मिली । निकोसी जैसे ही नदी पार करने लगा नदी उमड कर उसे डुबाने चली ।
"नदी माता ,मुझे शौक से डुबा लेना पर पहले मैं बहन से टीका तो करवा आऊँ ।" वह मेरी बाट देखती होगी । नदी भी शान्त होगई ।
भाई बहन की देहरी पर पहुँचा । बहन अपने भाई के आंवडे-पाँवडे( कुशलता की प्रार्थना) बाँचती चरखा कात रही थी कि तागा टूट गया । वह तागा जोडने लग गई । अब न तागा जुडे न बहन भाई को देखे । भाई खिन्न मन सोचने लगा कि मैं तो इतनी मुसीबतें पार कर आया हूँ और बहन को देखने तक की फुरसत नही । वह लौटने को हुआ तभी तागा जुड गया बहन बोली--अरे भैया मैं तो चरखा चलाती हुई तेरे नाम के ही आँवडे-पाँवडे बाँच रही थी । 
बहन ने भाई को बिठाया । दौडी-दौडी सास के पास गई ,पूछा--"अम्मा-अम्मा सबसे प्यारा पाहुना आवै तो क्या करना चाहिये ?" सास ने कहा कि करना क्या है गोबर माटी से आँगन लीपले और दूध में चावल डालदे ..। बहन ने झट से आँगन लीपा ,दूध औटा कर खोआ--खीर बनाई । भाई की आरती उतारी टीका किया । पंखा झलते हुए भाई को भोजन कराया ।
दसरे दिन तडके ही ढिबरी जलाकर बहन ने गेहूँ पीसे । रोटियाँ बनाई और अचार के संग कपडे में बाँधकर भाई को दे दीं । भाई को भूख कहाँ । आते समय सबसे कितने--कितने कौल वचन हार कर आया था । मन में एक तसल्ली थी कि बहन से टीका करवा लिया । 
उधर उजाला हुआ । बच्चे जागे । पूछने लगे---"माँ मामा के लिये तुमने क्या बनाया । बच्चों को देने के लिये बहन ने बची हुई रोटियाँ उजाले में देखीं तो रोटियों में साँप की केंचुली दिखी । कलेजा पकडकर बैठ गई -- "हाय राम ! मैंने अपना भाई अपने हाथों ही मार दिया ।"
बस दूध चूल्हे पर छोडा ,पूत पालने में छोडा और जी छोड कर भाई के पीछे दौड पडी । कोस दो कोस जाकर देखा ,भाई एक पेड के नीचे सो रहा है और 'छाक' ( कपडे में बँधी रोटियाँ) पेड से टँगी है । बहन ने चैन की साँस ली । भाई को जगाया । भाई ने अचम्भे से बहन को देखा । बहन ने पूरी बात बताई । भाई बोला---"तू मुझे कहाँ-कहाँ बचाएगी बहन ।" बहन बोली--"मुझसे जो होगा मैं करूँगी  पर अब तुझे अकेला नही जाने दूँगी ।"
भाई ने लाख रोका पर बहन न मानी । चलते-चलते रास्ते में वही नदी मिली । भाई को देख जैसे ही उमडने लगी । बहन ने नदी को चुनरी चढाई । नदी शान्त होगई । शेर मिला तो उसे बकरा दिया । शेर जंगल में चला गया । दरवाजे के लिये बहन ने सोने की ईँट रख ली । चलते-चलते बहन को प्यास लगी ।
भाई ने कहा--"बहन मैंने पहले ही मना किया था । अब इस बियाबान जंगल में पानी कहाँ मिलेगा ? बहन बोली-- "मिलेगा कैसे नही ,देखो दूर चीलें मँडरा रहीं हैं वहाँ जरूर पानी होगा ।" 
"ठीक है ,मैं पानी लेकर आता हूँ ।"
बहन बोली--- " पानी पीने तो मैं ही जाऊँगी ? अभी पीकर आती हूँ । तब तक तू पेड के नीचे आराम करना ।"  
बहन ने वहाँ जाकर देखा कि कुछ लोग एक शिला गढ रहे है । 
"भैया ये क्या बना रहे हो ?"
"तुझे मतलब ? पानी पीने आई है तो पानी पी और अपना रस्ता देख ।"
एक आदमी ने झिडककर कहा तो बहन के कलेजे में सुगबुगाहट हुई । जरूर कोई अनहोनी है । बोली- "भैया बतादो ये शिला किसके लिये गढ रहे हो ? मैं पानी तभी पीऊँगी ।"
"बडी हठी औरत है । चल नही मानती तो सुन । एक निकोसी पूत है । उसी की छाती पर सरकाने के लिये ऊपर से हुकम हुआ है ।"
बहन को काटो तो खून नही । माँ-जाए के लिये हर जगह काल बैरी बन कर खडा है । 
"उसने ऐसी क्या गलती करी है जो....?"
"तुझे आम खाने कि पेड गिनने ? तू पानी पी और अपना रास्ता देख ।" दूसरा आदमी चिल्लाकर बोला पर वह नही गई । वही खडी गिडगिडाने लगी --"सुनो भैया ! वह भी किसी दुखियारी माँ का लाल होगा । किसी बहन का भाई होगा । तुम्हें दौज मैया की सौगन्ध । बताओ ,क्या उसे बचाने का कोई उपाय नही है ?"
"हाँ उपाय तो है ।--आदमी हार मानकर बोला--- उसे किसी ने कभी कोसा नही है । अगर कोई कोसना शुरु करदे तो 'अलह' टल सकती ।" 
बस बहन को कैसी प्यास ! कहाँ का पानी ! उसी समय से उसने भाई को कोसना चालू कर दिया और कोसती-कोसती भाई के पास आई---"अरे तू मर जा । 'धुँआ सुलगे' ...'मरघट जले'...।"
"मेरी अच्छी--भली बहन बावली भी होगई । मैंने कितना मना किया था कि मत चल मेरे संग । नही मानी ।"---भाई ने दुखी होकर सोचा । जैसे-तैसे घर पहुँचे तो माँ हैरान । अच्छी भली बेटी को कौनसा प्रेत लग गया है कौनसे भूत-चुडैल सवार होगए हैं, जो भाई को कोसे जा रही थी । लडकी तो बावरी होगई ? 
"माँ कोई बात नही । बावरी है भूतरी है, जैसी भी है तो मेरी बहन । तू नाराज मत हो ।"
माँ चुप होगई बहन रोज उठते ही भाई को कोसती और दिन भर कोसती रहती । ऐसे ही कुछ दिन गुजर गए । एक दिन भाई की सगाई आई । बहन आगे आ गई---"इस जनमजले की सगाई कैसे होगी ?"
सबको बहुत बुरा लगा पर भाई ने कहा --"मेरी बहन की किसी बात का कोई बुरा मत मानो । वह जैसी भी है मेरी बहन है ।" 
फिर तो हर रस्म पर बहन इसी तरह भाई को रोकती रही टोकती रही और कोसती रही । भाई का ब्याह होगया ।
अब आई सुहागरात । बहन पहले ही पलंग पर जाकर लेट गई ।
"यह अभागा सुहागरात कैसे मनाएगा ? मैं भी वही सोऊँगी ।"
और सब तो ठीक पर सुहागरात में कैसे क्या होगा । ऐसी अनहोनी तो न देखी न सुनी । पर भाई ने कहा -कोई बात नही । मेरी बावरी बहन है । मैं उसका जी नही दुखाऊँगा ।हम जैसे भी रात काट लेंगे । फिर कोई क्या कहता ।
बहन रात में भाई और भौजाई के बीच लेट गई । पर पलकों में नींद कहाँ से आती । सोने का बहाना करती रही । आधीरात को भगवान का नागदेवता को हुकम हुआ कि फलां घर में एक नया-नवेला जोडा है उसमें से दूल्हा को डसना है । नागदेवता आए । पलंग के तीन चक्कर लगाए पर जोडा नही वहाँ तो तीन सिर और छह पाँव दिख रहे थे । जोडा होता तो डसता । बहन सब देख-समझ रही थी । चुपचाप उठी । तलवार से साँप को मारा और ढाल के नीचे दबा कर रख दिया । और भगवान का नाम लेकर दूसरे कमरे में चली गई । 
सुबह उसने सबको मरा साँप दिखाया और बोली--"मैं बावरी आवरी कुछ नही हूँ । बस अपने भाई की जान , मैया की गोद और भौजाई का एहवात ( सुहाग) बचाने के लिये यह सब किया । जो भूल चूक हुई उसे माफ करना ।"
भाई-भौजाई ने बहन का खूब मान-पान रखा । बहन खुशी-खुशी अपने घर चली गई । 
जैसे इस बहन ने भाई की रक्षा की और भाई ने बहन का मान रखा वैसे ही सब रखें । जै दौज मैया की । 

Monday, October 14, 2013

कहानी-सम्राट के बहाने

पिछला सप्ताह अपेक्षाकृत कुछ अलग और उल्लासमय रहा । आदरणीय श्री जगदीश तोमर जी ने कई माह पहले ही मुझे बता दिया था कि आपको उज्जैन चलना है । 
सेवा-निवृत्त प्राचार्य श्री तोमर 'सृजन-संवाद' के सम्पादक ,बाल-साहित्य के रचनाकार , निष्पक्ष व प्रबुद्ध समालोचक ,मध्यभारत हिन्दी-साहित्य सभा ग्वालियर के अध्यक्ष होने के साथ प्रेमचन्द सृजन पीठ उज्जैन के निदेशक भी हैं । कहानी व उपन्यास के सम्राट प्रेमचन्द की जन्मतिथि व पुण्यतिथि के अवसर पर सृजन पीठ द्वारा कथा-गोष्ठी ,कहानी लेखन प्रतियोगिता के साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं । 
मेरे अनिश्चय को देखकर वे बोले कि "अरे आपको तो आना चाहिये । अच्छा रहेगा ।" मैं यह जानकर आश्वस्त हुई कि ग्वालियर से श्रीमती चतुर्वेदी भी जा रहीं थीं । हालांकि वे अपने पति को भी साथ ले जा रहीं थीं और वहाँ वे अलग स्पेशल कमरे में रहने वालीं थीं इसलिये उनका मेरा कोई खास मेल तो नही था । लेकिन ट्रेन में तो हम साथ ही जाने वालीं थीं फिर शिवपुरी से डा. पद्मा शर्मा भी जा रही थीं । खुशी की बात यह भी थी कि वहाँ मुझे मीनाक्षी स्वामी मिलने वालीं थीं ।
सुश्री डा. मीनाक्षी स्वामी इन्दौर के शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं । वे अपनी कृतियों ( भूभल ,नतोsहं आदि ) के लिये अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी हो चुकीं हैं । पर मेरे लिये उनका मिलना साहित्यिक की अपेक्षा व्यक्तिगत रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण था । वे लखनऊ में आयोजित बाल-साहित्य लेखन की दो कार्यशालाओं में मेरे साथ थीं । मधु बी. जोशी जी ,मीनाक्षी और मैंने वहाँ काफी आत्मीय क्षण बिताए थे । उन पलों को फिर से जीने के साथ यह भी देखूँगी कि इतने सारे पुरस्कारों से सुसज्जित होकर अब मीनाक्षी कैसी दिखती हैं । मैं चलने के लिये तैयार होगई । सुयोग से मैडम ने भी अवकाश स्वीकृत करने में कोई बेरुखी नही दिखाई ।

जिस सुबह हम उज्जैन पहुँचे मन उल्लास से भरा था । पहली बार महाकाल की नगरी देखने का अवसर जो मिला था । मुझे यह देखकर काफी अच्छा लगा कि उज्जैन सादा और शान्त शहर है । हम लोग जहाँ भी गए बहुमंजिला इमारतें देखने नही मिलीं । हाँ मन्दिर कदम-कदम पर हैं ।
स्टेशन से विक्रम विश्वविद्यालय का अतिथि-गृह ,जहाँ हम ठहरे थे ,ज्यादा दूर नही है । हमारे साथ शिवपुरी से पत्रकार श्री प्रमोद भार्गव और मुरैना से श्री रामबरन शर्मा भी थे । मेरी नजरें मीनाक्षी को तलाश रहीं थीं । पता चला कि मैडम जी अपनी कार से आ रहीं हैं और आज ही अपनी कहानी पढकर वापस भी चली जाएंगी ।
 धत्.. मैं आज भी वही ठेठ देहातिनों जैसे विचार रखती हूँ कि पुरानी सहेलियों की तरह रात में एक साथ जागकर ढेर सारी बातें करेंगे । कुछ यादें ताजा करेंगे । मैं लेखन विषयक कुछ सूत्र जानूँगी कि वह लिखने के लिये कब और कितना समय देतीं हैं । उपन्यास लिखने के लिये भी कुछ निर्देश लूँगी । लोग धडाधड उपन्यास लिख डालते हैं और मैं हूँ कि बीस साल से एक उपन्यास को लेकर सिर्फ सोच रही हूँ । शायद लेखकों से मिलने का यह सबसे बडा लाभ होता है कि कलम चल पडती है । पर ऐसा कुछ नही हुआ । मीनाक्षी गोष्ठी से कुछ ही समय पहले आईं और कथा-पाठ के बाद जाने के लिये तैयार भी होगई । लेकिन यह देख अच्छा लगा कि मीनाक्षी अब भी वैसी ही हैं । अपनी सी । इन बारह सालों में उसकी खूबसूरती में कोई अन्तर नही आया । पर मुझे देखते ही वह विस्मित हुई---"अरे यह तुम हो ? लखनऊ में तो लगता था कि हवा के साथ कहीं उड न जाओ । हर समय बीमार लगतीं थीं । अब तो अच्छी खासी सेहत है ।" और हँसने लगीं । मन एकदम हल्का होगया । 
पहले दिन कथा-गोष्ठी 'कालीदास--अकादमी' में थी । शाम को जब मीनाक्षी जाने लगीं तो मुझे कुछ खालीपन का अनुभव हुआ । पता नही क्यों मैं ही मैत्री के लिये इतनी लालायित रहती हूँ । मुझे ही लगता है कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है । और यह भी कि मुझे एक अच्छे साथी और निर्देशक की जरूरत है । 
मैं अपने कमरे में लौटी ही थी कि अचानक मीनाक्षी ने फोन किया--"जल्दी बाहर आओ । जरूरी काम है ।" बाहर आई तो आदेश मिला--"गाडी में बैठो ।" फिर ड्राइवर से बोली--"चलो ।"
"अरे ..अरे कहाँ ? मुझे पद्मा और दूसरे लोगों को तो बताने दो ।" मैं इस आकस्मिक और अप्रत्याशित सी 'घटना' पर हैरान हुई ।
"चुपचाप बैठो "--मीनाक्षी ने रौब से कहा--"तुम्हें किडनैप कर इन्दौर ले जा रही हूँ ।" और फिर हँस पडीं । बोली---"अरे तुमसे बातें ही नही होपाईं । सोचा कि काल-भैरव के दर्शन भी करलें इसी बहाने कुछ समय भी साथ बितालेंगे ।"
रास्ते में हम अपने अलावा लखनऊ में साथ रहे कुछ और साथियों की बातें भी करते रहे । मीनाक्षी ने 'नतोsहं' की रचना के बारे में कई बातें बताईं कि यह पूरी तरह उज्जैन और सिंहस्थ मेले पर केन्द्रित है । कि इसके लिये उन्हें इन्दौर से उज्जैन के सैकडों चक्कर लगाने पडे । कि इसके लिये साधु-सन्यासियों , अघोरियों व पुजारियों से भी संवाद रखने पडे वगैरा..वगैरा..। 
कालभैरव को शराब का भोग लगता है । पुजारी ने बोतल में से थोडी सी शराब निकाली और कालभैरव की प्रतिमा के होठों से लगादी । शराब बेचने वालों और पुलिस के बीच धरपकड और लुकाछिपी का नाटक कुछ पलों के लिये ही चला । जैसे ही पुलिस की गाडी मुडी, बोतलें फिर से निकल आईं । 
"तुम्हें एक छुट्टी और लेकर आना था ।" मैंने कहा तो बोली----"अरे यार मकान का चक्कर है । छुट्टियाँ भी कहाँ मिल रहीं हैं । फिर जितना समय मिल जाए काफी है । पर तुमसे मिलकर अच्छा लग रहा है ।"
"मेरी कहानी तो सुन लेतीं । कुछ कमियाँ बतातीं । कुछ....।" मैंने कहा तो वह मेरे कन्धे को दबाकर बोली--
"रहने दो । मैंने तुम्हारी कुछ कहानियाँ पढीं हैं ।" 
मैंने पाया कि मीनाक्षी आज भी वैसी ही है । रचनाकार से पहले वह एक महिला है मेरे जैसी यानी किसी भी आम महिला जैसी । भय और सन्देहों से भरी । स्नेह और ईर्ष्या से रची-बुनी । एकदम बच्चों जैसी ....। क्षितिज के पार देखती सी आँखों में एक मासूमियत..। 
डा. पद्मा शर्मा के दो कहानी संग्रह आ चुके हैं जिनका विमोचन उनके कथनानुसार प्रख्यात आलोचक डा.नामवरसिंह और ममता कालिया ,पद्मा सचदेव आदि जैसी कथाकारों द्वारा किया गया है । यह अपनेआप में बडी उपलब्धि है जिसकी अनुभूति उनके व्यक्तित्त्व से बखूबी छलक रही थी । वे भी शाम को लौट गईं । मुझे निराशा हुई कि कहानी के मर्मज्ञ रचनाकार तो चले ही गए । मेरी कहानी को पता नही कौन सुनेगा । सुनेगा भी या नही । 
दूसरे दिन सुबह बडी आसानी से हमने महाकालेश्वर के दर्शन किए । वहीं पोहा-जलेबी का नाश्ता किया जो वहाँ का एक आदर्श व स्वादिष्ट नाश्ता है । क्षिप्रा को देखना बहुत सुखद नही था । हालांकि घाट सुन्दर बने हैं । अभी तो पानी भी भरपूर है । पर निर्मलता का अनुभव नही हो रहा था । सुबोध दीदी का अनुकरण करते हुए मैंने अंजुरी में जल लेकर अपने ऊपर छिडक लिया । नहाने का विचार तो वैसे भी नही था ,पर होता तो भी वहाँ पहुँचकर छोडना ही पडता । सिर्फ धार्मिक भावना-वश मैं ऐसी जगह स्नान नही कर सकती जहाँ गन्दे पानी की बदबू आ रही हो । हम नदियों को माता भी मानते हैं और उनके साथ बिना किसी अपराध बोध के दुर्व्यवहार भी करते हैं ।मानव समाज की तरह ही जिसमें माँ और कन्या को पूजनीया कहा जाता है पर मात्र शब्दों में ।व्यवहार में उनकी हालत भी नदियों जैसी ही है । नहाने धोने व सींचने के साथ गन्दगी बहाने का भी साधन, नदियाँ हमारी 'पूजनीया माँ !!' 
दोपहर बारह बजे से विक्रम विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग में कहानी व लघुकथाओं का वाचन होना था । गणमान्य श्रोता-समीक्षकों में विक्रम विश्वविद्यालय और माधव महाविद्यालय के हिन्दी के तीन विद्वान प्रोफेसर, राष्ट्रीय साहित्य परिषद् के संगठनमंत्री श्री श्रीधर पराडकर जी ,ऋषिकुमार मिश्र (मुम्बई रेलवे) और बहुत सारे कथाकार थे । तीन-चार कहानियों में से सुनाने के लिये कहानी का चयन करना मुझे काफी उलझन भरा लगा । अन्त में कर्जा-वसूली कहानी पढना सुनिश्चित किया । 
कहानी पर उनकी टिप्पणियों को यहाँ देना अनावश्यक है । यहाँ महत्त्वपूर्ण है सर्वाधिक अपेक्षित आपकी राय । कहानी कृपया पढें ।
शाम को हमें इन्टरसिटी से वापस ग्वालियर आना था । 
बुधवार की सुबह ग्वालियर स्टेशन पर उतरते समय मन में भी कहानी-सम्राट को याद करने के बहाने की गई उज्जैन की य़ात्रा के खूबसूरत पलों की धूप खिल रही थी ।

Tuesday, September 24, 2013

सुने बिना ही ....

जब पूरी तरह मुझे सुने बिना ही 
तुम निकल जाते हो 
जैसे कोई जल्दबाज हॅाकर  
अखबार फेंककर
किसी दूसरी गली में होजाता है ओझल ,
 तब छोड जाते हो किसी बच्चे को 
जैसे अकेला और आकुल
किसी सुनसान, अँधेरे,
और भुतहे घर में...।

जैसे फटाक् से गिरा देता है कोई शटर

राशन के लिये 
लम्बी लाइन में लगे
किसी आदमी का 
नम्बर आने से पहले ही । 

गुल होजाती है जैसे बिजली 

अचानक रात के अँधेरे में ,
किसी बहुप्रतीक्षित पत्र को,
पढने से पहले ही...।

और जैसे थप्पड मार देता है कोई शिक्षक 

अपने छात्र को ।
उसका सवाल सुने समझे बिना ही ।

नही जाना चाहिये तुम्हें ,

या कि किसी को भी  
वह बात सुने बिना 
जो दिल में छुपी  रहती है 
दर्द की तरह 
जिन्दगी को जकडे हुए 
एक ही जगह पर ।

Sunday, September 22, 2013

'और भी हैं दुनिया में' बडे मियां'

श्रीमती ग ने आखिर लीलावती के आगे हाथ जोड लिये । कहा--"मुझे बख्श दे मेरी माँ ! मैं तुझसे हार गई हूँ ।" 
और तभी मुझे एक कहानी याद आगई जो बचपन में माँ सुनाया करती थी । संक्षेप में कहानी कुछ यों थी -- 
दो भाई थे । बडे मियां और छोटे मियां । एक दिन बेरोजगारी से तंग आकर दोंनों ने तय किया कि एक भाई को नौकरी करने जाना चाहिये । बडे भाई ने कहा तू छोटा है । काम मैं करूँगा । तू मेरा इन्तजार करना ।
 इस तरह बडे भाई ने घूमघाम कर एक दम्पत्ति के यहाँ नौकरी करली । उनमें  बेगम तो सीधी थी पर शौहर बडा काइंया था । उसने बडे मियां के सामने शर्त रखीं---जो भी काम कहें ,उसे करना होगा । खाने के नाम केवल पत्ता भर खिचडी मिलेगी । सबसे खास बात यह कि अगर हम तुझे काम से हटाएं तो हम अपने नाक कान देंगे और डबल पगार भी । लेकिन अगर तूने काम छोडा तो अपने नाक-कान  तो देने ही होंगे , पैसा भी नही मिलेगा सो अलग । मंजूर है ?" 
"मंजूर है-"--बडे भाई ने कहा और काम पर जुट गया । सुबह से शाम ,देर रात तक वह काम में भिडा रहता था । जंगल से लकडी लाना । घोडों की मालिश ,दाना पानी , खाना पकाना , कपडे धोना ,घर की सफाई आदि जो भी काम मिलता पूरे मन से करता था । पर सीधा होने के साथ कुछ बुद्धू भी था । खिचडी के लिये जो भी पत्ता बेर ,बरगद , पाखर, पीपल मिलता ले आता । उस पर भला कितनी खिचडी मिलती । इस तरह दिन भर में एक डेढ या अधिक से अधिक दो चमचा भर खिचडी मिलती थी । और कुछ खाना शर्त में था नही सो भूखे ही वक्त गुजारना पडता था । महीना भर में कुछ कमाना तो दूर ,बडे मियां को खुद को खडा रखना भी दुश्वार होगया । हड्डियाँ--पसलियाँ बाहर झाँकने लगीं थीं । अन्त में उसे उसे खयाल आया कि ऐसे मरने से तो अपने भाई के साथ भूखे रह कर मरना ज्यादा ठीक होगा ।
" मुझे माफ करें अब मुझसे काम नही होगा ।"   ए"क दिन उसने कह ही दिया । 
"खुद जारहे हो तो शर्त के मुताबिक अपने नाक-कान दे कर जाओ ।" और बडे मियांजी -'लौट के बुद्धू घर को आए' वाली कहावत के अनुसार अपने नाक-कान देकर घर लौट आए । 
फिर छोटे भाई ने कैसे सूझबूझ व चालाकी से उस दम्पत्ति नाकों चने बिनवाए और कैसे  अपने भाई का बदला लिया ,यह बेहद रोचक किस्सा है । सो फिर कभी । 
अभी तो मेरा ध्यान श्रीमती ग और लीलावती के प्रसंग पर है । लीला काफी चतुर ,फुर्तीली और हाजिर जबाब युवती कपडे धोने का काम करती है । ग काफी संवेदनामयी महिला है । मुसीबत में किसी को ना नही कह पातीं । लीला ने एक दिन अपने बच्चे लाकर 'ग' के सामने खडे कर दिये और अपनी व्यथा-कथा सुनादी ।
"दीदी थोडी मेहरबानी होजाए । आपके करे मेरे बच्चे परीक्षा दे सकेंगे । इनकी फीस नही भर पाई हूँ सो मास्टर किलास में नही घुसने देरहे । कहते हैं पहले फीस लाओ । दीदी फीस नही भरी तो बच्चों का साल बरबाद होजाएगा ।"
"तो मैं क्या करूँ ?"
"बस दो हजार रुपए दे दो दीदी । तुम्हारा एहसान रहेगा । मैं जैसे कहोगी पटा दूँगी ।"
" बस दो हजार ??"---ग को अजीब लगा । घर बैठा पति अक्सर शराब में धुत रहता है । केवल कभी-कभी कपडों पर प्रेस करके पाँच--पचास रुपए कमा लेता है जो उसकी ठर्रा की बोतल में ही चले जाते हैं । और घरों में कपडे धोकर गुजारा करने वाली लीला दो हजार के लिये 'बस' कह रही है ?बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नही पढाती जहाँ कोई फीस नही है अगर है भी तो बहुत कम । खाना ,किताबें ,यूनिफार्म तथा छात्रवृत्ति अलग मिलती है । लेकिन ग इतने सालों के अनुभव से जान चुकी है कि जो लोग बच्चों के भविष्य के प्रति सजग हैं ,वे सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों में भेज कर और बच्चे को "ए फार एप्पल" रटते देख उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त ( या भ्रमित ) होजाते हैं । लीला भी उन्ही में से है । हालांकि यह लोगों का व्यक्तिगत मामला है । लेकिन ग चूँकि बात की तह तक जाकर देख-समझ चुकी है इसलिये उसे यह खर्च बिल्कुल अनावश्यक लगा । इसलिये एकदम हाँ नही कहा । 
"दीदी आपके लिये कोई बडी बात नही है । मुझे पता है कि आप मना नही करोगी और यह न सोचें कि मैं ऐसे ही ले रही हूँ "--लीला ग को चुप देखकर याचना के स्वर में बोली--
"चाहें तो कपडे धुलवा लेना नही तो तीन-चार किश्तों में पटा दूँगी ।" 
ग ने एक माँ को देखा । माँ के पीछे खडे दो बच्चों को देखा और बच्चों की आँखों में मासूम सवाल देखे और पाँच-पाँच सौ के चार नोट लाकर रख दिये । 
"तो दीदी कपडे धो दिया करूँगी ?"
"लीला मैं अपने कपडे तो किसी से धुलवाती नही हूँ हाँ तुम चाहो तो आयुष के कपडे धो दिया करना । कालेज व पढाई के कारण उसके पास समय नही रहता । इस तरह तुम्हें भी आसानी होगी --ग ने कहा ।
रोज आऊँ या एक दिन छोड कर । क्या है कि रोज तो कपडे निकलेंगे नही ।
रोज न सही एक दिन छोड कर आजाना  लेकिन उसमें लापरवाही मत करना ।"
कैसी बात करती हो दीदी । मेरा काम देख लेना तब कहना । लीला ने उस दिन तो मन लगाकर कपडे धोए । 
इस बात को पाँच महीने बीत गए । इन पाँच महीनों में लीला पच्चीस दिन भी कपडे धोने नही आई । और जब भी आई कपडों को ऐसे ही कूट-पखार कर डाल गई जैसे कोई मुसीबत टालता है । इस बीच ग को खुद ही कपडे धोते और लीला के साथ लगभग इसी तरह के संवाद करते--करते आधा वर्ष निकल गया-
"लीला ,आयुष कह रहा था तुम कालर वगैरा ठीक से साफ नही करती । बहन जरा ठीक से ....।" 
"नही दीदी ,मेरे धुले कपडों को कोई ऐब नही लगा सकता ।" ---लीला बीच में ही बोल पडती है ।
"लेकिन मैंने खुद देखा ।"
"तो रह गया होगा । वैसे मैं तो...।" 
"अच्छा छोडो  ,कल तुम  क्यों नही आई ? रात भर कपडे पडे रहे दूसरे दिन बदबू आने लगी तब मैंने ही धोए जबकि एक दिन छोड कर आने का तय हुआ था न । मैंने इसी भरोसे कपडे पाउडर में भिगो कर रखे थे ।"
"रखे होंगे दीदी ,लेकिन  हुआ यह कि मैं बहन के लडके की 'बड्डे' में चली गई थी ।" 
"बड्डे में ?"---एक बार तो ग के अन्दर गरमाहट आई । जन्मदिन मनाने के लिये काम ही छोड दिया । लेकिन तंगहाल स्त्री से क्या कहे, संयम रखते हुए कहा --"बर्थ डे तो शाम को मनाया होगा लीला । कपडे तो दिन में धुलने होते हैं ।"  
"मैं तो दिन में आई थी पर तुम्हारा ताला लगा था ।"
"उफ्..." ग के अन्दर इस बार उबाल सा उठा । वह कितनी बार बता चुकी कि सवा दस बजे मैं हर हाल में स्कूल निकल जाती हूँ  और आयुष भी ।लीला, नौ सवा नौ तक कपडे धो जाया कर । इसके बाद आएगी तो ताला तो मिलेगा ही ।
"तो क्या करूँ दीदी उसी समय बोरिंग आती है । और उसी समय एक घंटे के लिये लाइट भी रहती है । फिर कटौती होती है । उस समय रोटी न बनाऊँ तो दिन भर भूखे रहना पडेगा कि नही ?"
"तो खाना हीटर पर ही बनाती है ? चूल्हा या गैस .?"..
"अरे दीदी ! जब मुफत में काम चल रहा है तो गैस खर्च क्यों करे ? और लकडी तो बाबा के मोल आ रही हैं । बिजली तो 'डारैक्ट' मिल जाती है । कोई खरचा नही ..।"
"लेकिन दूसरे घरों में भी तो  सुबह समय से काम कर जाती हो । तभी कुछ देर के लिये मेरे यहाँ भी आ सकती हो कि नही ?" रोज तो नहीं न आना ..।
"आप कह तो सही रही हैं पर..।"
"सोचो लीला मुझ पर क्या बीतती है जब स्कूल से लौटकर बाल्टी भर कपडे धोती हूँ ।" ---ग बेवशी भरे लहजे में कहती है । रुपए जो फँस गए हैं ।दो हजार इतने कम भी नही होते कि भुला दिये जाएं । और लीला लौटाने में असमर्थता जताए तो भुलाए भी जा सकते हैं । 
"सो तो है दीदी पर सब मजबूरी कराती है ।--लीला पर कोई असर नही होता ।बडप्पन से कहती है -- "अब देखो, आज मैं मजबूर न होती तो क्यों घर-घर भटकती फिरती ? क्यों तुम इतना कह लेतीं "
"मैं ??"...अब ग का धैर्य टूटने लगता है ---"मैंने तो अभी कुछ कहा ही कहाँ है । यह तो चोरी और सीनाजोरी वाली बात होगई ।"   
"हे भगवान अब तो चोरी भी लगा रहीं हैं दीदी ! हम गरीब जरूर हैं पर किसी का सोना पडा रहे देखते तक नही हैं । कहलो दीदी । हमें तो भगवान ने सुनने के लिये ही बनाया है ।" 
"बकवास बन्द कर लीला और अपने घर जा । गलती की जो ...।"  ऐसे में ग पूरी तरह आपे से बाहर होजाती है। 
"जा ही तो रही ही हूँ दीदी ,गुस्सा काहे हो रही हैं ।"
लीला आराम से चली जाती है और ग' संयम खो देने की ग्लानि से भर जाती है । उसे काम लेना ही नही आता शायद । उसे अपनी तरह ही अपना काम समय पर और सही ढंग से करने वाले लोग ही पसन्द हैं । अगर देर होती है तो वह कैसे अपना टिफिन लिये बिना स्कूल चली जाती है । भूखा रहना मंजूर है प्राचार्य की डाँट सुनने की बजाय । लीला चाहे तो समय पर आराम से काम कर सकती है । वह भी सप्ताह में तीन दिन ही तो आना है लेकिन उसे मालूम है कि यह काम वह रुपए चुकाने के लिये कर रही है रुपए तो मिलेंगे नही । उसे लीला पर नही उसके तरीकों और सोच पर गुस्सा आता है । आते ही पहले तो आदेश सा छोडती है --"दीदी जरा बढिया सी चाय तो बनादो ।" 
चाहे वह स्कूल के लिये तैयार हो रही हो ,चाय बना ही देती है । खाने-पीने की चीजों के लिये वह वशभर नही टालती । 
पर लीला कपडे भी ऐसे धोती है मानो कोई बहुत बडा एहसान कर रही हो । वह भी लगातार बडबडाते हुए---"यह शर्ट का कालर कितना चीकट हो रहा है । यह टीशर्ट तो साफ ही नही होती कितना ही रगडो । दीदी जींस के लिये गरम पानी दिया करो । अरे इतने कपडे कहाँ से इकट्ठे कर लिये ?"
"लीला पूरे सप्ताह बाद बाद आएगी तो कपडे तो मिलेंगे न ! तुम तो एक दिन छोड कर आने वाली थी न ?"
"अब आप तो सब कहती हो , पर मुझे भी तो सहूलियत देखनी पडेगी ।" 
सहूलियत...अब ग का धैर्य टूटने लगा है । नानी कहती थी --आस पराई जो करे जीवत ही मर जाय..। महज रुपए वसूलने के लिये लीला के भरोसे ऐसे वह कब तक खुद को जलाती रहेगी । उससे कोई सहारा तो मिलने से रहा । ना , अब नही । इससे तो अच्छा है कि वह अपना काम खुद करलो । 
"कितने रुपए कट गए दीदी ? लिखती रहना । मैं तो भूल जाती हूँ ।"--एक दिन लीला ने पूछा तो 'ग' ने आखिर कह ही दिया---"जितने कटने थे उतने कट गए मेरी माँ । अब मुझे बख्श दे । जो बाकी रह गए हैं उन्हें चाहे तो देना नही तो मेरी तरफ से बच्चों के लिये भेंट समझ लेना ..। अब मैं कपडे खुद धो लिया करूँगी ।"
"आपकी मर्जी दीदी मैंने तो मना किया नही ।"  --लीला जैसे मुक्त होकर बोली । ठीक ही तो है उसने खुद मना कहाँ किया । हाँ 'ग 'से करवा लिया । 
और इस तरह पैसों से हाथ धोकर अब 'ग 'कपडे खुद ही धोरही है ।


Monday, September 16, 2013

मातृभाषा --शिक्षा का सही माध्यम

14 सितम्बर ( हिन्दी-दिवस) 
--------------------------------------
भाषा और शिक्षा 
भाषा अभिव्यक्ति का सबसे उपयुक्त और सशक्त माध्यम है । किसी भी व्यक्ति का बौद्धिक विकास, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना की समझ ,विचार ,दृष्टिकोण एवं जीवन--दर्शन उसकी भाषा से ही निर्धारित होता है । भाषा कोई भी हो वह आन्तरिक विकास के द्वार खोलती है । ज्ञान दृष्टिकोण , और अनुभव के विस्तार को व्यापक बनाती है । 
भाषा महज एक विषय नही ठोस आधार है जिस पर शिक्षा का भवन खडा होता है । धरती है जिस पर ज्ञान की फसलें लहलहातीं हैं । इसलिये  जहाँ तक शिक्षा व ज्ञानार्जन का प्रश्न है ,माध्यम के रूप में ऐसी भाषा होनी चाहिये जो सहज ही आत्मसात् होसके । 
मातृभाषा ही शिक्षा का सही माध्यम 
एक सात साल की बच्ची याद कर रही थी --"द सन राइजेज इन द ईस्ट । द सन् राइजेज....।" चार-पाँच बार रटने के बाद वह अचानक माँ से पूछ बैठी --"इसका मतलब क्या होता है मम्मी ?" 
मैंने कहा---"इसे अब तुम ऐेसे याद करो--'सूरज पूर्व में उगता है' ।" 
"इसमें याद क्या करना । वो तो मुझे पता ही है ।"-- बच्ची तपाक् से बोली । 
इसी तरह एक दिन एक प्रसिद्ध कान्वेन्ट के सातवीं कक्षा के एक छात्र से प्रसंगवश ,जैसी कि आमतौर पर शिक्षक की आदत ( अच्छी या बुरी ) प्रश्न करने की होती है, मैंने पूछा ---
"पृथ्वी पर कितने महासागर हैं ?" वह मेरी ओर देखने लगा फिर बोला--"क्या ,कितने हैं ?"
" बच्चे की उलझन सही है "--मुझे याद आया । अच्छे माने जाने वाले अंग्रेजी स्कूलों में हिन्दी में समझाना तो दूर हिन्दी बोलना तक वर्जित है । जब बच्चा प्रश्न ही न समझेगा तो उत्तर कैसे देगा । "हाउ मैनी ओसन्स ऑन द अर्थ ?" जब मैंने पूछा तो उसने तुरन्त कहा-- 
"ओ ,ऐसे पूछिये न ! देअर आर फाइव ओशन्स ऑन द अर्थ ।" 
"शाबास । तो बताओ ओशन के बारे में क्या जानते हो ?" 
"यह ओसन होता क्या है ?" --मेरे इस सवाल पर वह बगलें झाँकने लगा । जाहिर है कि उसे समुद्र के बारे में कुछ मालूम ही नही था ।
इन दोनों उदाहरणों में से पहले में दूसरी भाषा के माध्यम से पढाई करने की कठिनाई का सच है । और दूसरे में छात्र में पढने व रटने की क्षमता तो है पर समझ का अभाव है । इसमें शिक्षक की सही भूमिका की कमी तो है ही लेकिन जहाँ रटा कर कोर्स पूरा कराने की विवशता हो वहाँ समझाने की गुंजाइश ही कहाँ होती है ?
 विषय को पढ़ना और विषय को समझते हुए पढ़ना बिल्कुल अलग बातें हैं । लिपि याद करने पर किसी भी भाषा या विषय को पढा़ तो जासकता है लेकिन समझते हुए पढ़ना मातृभाषा में जितना सहज व सरल होता है अन्य भाषा में नही । अन्य भाषा के माध्यम में वही ज्ञान काफी श्रमसाध्य होजाता है जो अपनी भाषा में सहज ही आत्मसात् होता है ।
यही कारण है कि विश्व के लगभग सभी देशों में अपनी भाषा को प्राथमिकता दी जाती है । रूस में तो एक कहावत भी बद्दुआ के रूप में प्रचलित है जो मातृभाषा के महत्त्व को बड़ी गंभीरता से व्यक्त करती है----"अल्लाह तेरे बच्चों को उस भाषा से वंचित करे जिसमें तू बोलती है ।" 
सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर जी ने भी कहा है कि व्यक्ति मातृभाषा में ही अच्छी तरह सीख समझ सकता है । क्योंकि वही हमारे हदय के सर्वाधिक निकट होती है । मातृभाषा में ही व्यक्ति पूर्णता व सच्चाई के साथ स्वयं को व्यक्त भी कर सकता है । 'गीतांजली '(गुरुदेव) 'रामचरितमानस ','गोदान' जैसी विश्व-प्रसिद्ध कृतियाँ मातृभाषा में ही लिखी गईं हैं ।
वास्तव में मातृभाषा कब अनायास ही हमारे व्यक्तित्त्व का हिस्सा बन जाती है पता नही चलता । उसमें पारंगत होने के लिये अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता नही होती । इसलिये आवश्यकतानुसार भाषा कोई भी सीखें ,लेकिन शिक्षा के लिये मातृभाषा ही सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है । 
अंग्रेजी माध्यम का सच--
ज्ञान व सारे तथ्य तो एक ही होते हैं चाहे उसे अंग्रेजी माध्यम से सीखें या हिन्दी माध्यम से या किसी अन्य भाषा के सहारे । महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें किस माध्यम से आसानी से आत्मसात् किया जासकता है । जब गन्तव्य तक पहुँचने का  सही ,आसान व छोटा रास्ता हमें मालूम हो तो लम्बे और कठिन मार्ग से जाने की जरूरत क्या है । डा. प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा है कि,---"अँग्रेजी माध्यम में छात्रों का अधिकांश समय तो अधकचरी रटन्त में ही नष्ट होजाता है । यही समय व शक्ति ज्ञानार्जन व योग्यता विस्तार में लगाई जाए तो उनका कितना गुणात्मक विकास होगा ।" सही तो है । पेट भरने की चिन्ता में लगे लोगों के लिये चिन्तन व सृजन की बातें बेमानी ही हैं ।  
अंग्रेजी माध्यम के विस्तार का कारण कुछ लोगों ,बल्कि अधिकांश लोगों का यह विचार है कि इससे  अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार होजाता है जो आज की सर्वाधिक आवश्यकता है । आज शिक्षा पर भी बाजारवाद बुरी तरह से हावी है । वैश्विक उदारवाद की अवधारणा के बीच विदेशी प्रभाव और नियंत्रण के कारण लोगों का यह विश्वास दृढ होगया है कि अंग्रेजी ही अच्छी नौकरी मिलने व उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है । विकास का पर्याय है । 
यह बात  सच है भी तो कुछ ही हद तक सच है । पूरा सच नही । पहली बात तो यह कि शिक्षा का पहला उद्देश्य ज्ञानार्जन है जिसके लिये अंग्रेजी माध्यम ( न कि अँग्रेजी भाषा-ज्ञान ) अनावश्यक है । दूसरे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और तकनीकी क्षेत्रों को छोड दें तो अँग्रेजी के बिना भी योग्य व शिक्षित व्यक्ति नौकरी भी कर रहे हैं और सन्तुष्टि व आत्मसन्तोष के साथ । आखिर कम्पनियाँ ही तो  देश को नही चला रहीं । चीन, जापान ,रूस और फ्रांस जैसे अनेक विकसित देश हैं जहाँ अपनी भाषा ( अँग्रेजी नही ) के बल पर उन्नति हुई है । 
चलिये , मान भी लें कि अंग्रेजी आवश्यक है  ही ,तो कौन कहता है कि मातृभाषा में पढ़ कर शिक्षित हुआ व्यक्ति अंग्रेजी में पारंगत नही हो सकता । बल्कि अधिक सरलता से हो सकता है । और हुआ भी है । डा. अब्दुल कलाम, डा. कृष्ण कुमार जैसे असंख्य उदाहरण हमारे देश में मौजूद हैं । तथ्य यह है कि जो छात्र पहले हिन्दी में ( अपनी मातृभाषा में ) संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण ,वाक्य आदि समझ चुके होते हैं वे नाउन ,प्रोनाउन ,वर्ब, एडजेक्टिव आदि बड़ी आसानी से समझ लेते हैं और याद कर लेते हैं । हम लोग विद्यालय में हिन्दी निबन्ध-लेखन ,शुद्ध व सुलेख-लेखन जैसी प्रतियोगिताएं कराते रहते हैं । मुझे यह देख कर सुखद आश्चर्य होता है कि विजयी प्रतिभागी अधिकतर अँग्रेजी माध्यम वाले  भी वे ही छात्र होते हैं जो अपनी कक्षा में हर विषय में शीर्ष पर हैं । यानी जिनकी हिन्दी अच्छी है वे ही अँग्रेजी में भी आगे हैं । 
हाँ अँग्रेजी माध्यम से संवाद-शैली और तौर-तरीके में अवश्य परिवर्तन आता है (वह भी केवल अच्छे स्कूलों में ) जो छात्र को 'कॅान्फिडेंस' और 'एडवांस' होने का अहसास अवश्य देता है लेकिन उसका ज्ञान से क्या सम्बन्ध ? ज्ञान तो स्वतः आत्मविश्वास का पर्याय है  क्योंकि ज्ञान  व्यक्तित्त्व को  विस्तार देता है . अतः बार-बार यह कहने की आवश्यकता नही कि ज्ञान का विस्तार अपनी भाषा के माध्यम से ही ज्यादा सहज सुलभ होता है । 
वास्तव में जब हमारा परिवेश हिन्दी का है तो शिक्षा अंग्रेजी में क्यों ? 
इससे भी एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भाषा और संस्कृति  का साथ अभिन्न होता है हम जिस भाषा को अपनाएंगे  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हमारी जीवन शैली  और विचार भी वैसे ही बनेंगे  . इसीलिये  भारतेन्दु जी बहुत पहले ही कह गए कि -"निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति कौ मूल .."
अँग्रेजी माध्यम के प्रसार के पीछे यह तथ्य भी सर्वमान्य बन गया है कि हिन्दी माध्यम वाले स्कूलों में अच्छी पढ़ाई नही होती । अगर यह सच भी है तो इसमें शिक्षकों व दूसरी व्यवस्थाओं का दोष है हिन्दी माध्यम का नही । अँग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में माध्यम की कठिनाई के कारण अधिक श्रम करना पडता है ज्ञान के विस्तार के लिये नही ।  
जितना श्रम शिक्षक व छात्र अँग्रेजी माध्यम में करते हैं उससे आधा भी जहाँ हिन्दी माध्यम में करते हैं वहाँ शिक्षा व ज्ञान निश्चित ही शिखर पर देखा जासकता है । 
उल्लेखनीय है कि  यहाँ अँग्रेजी भाषा का विरोध नही है ।  भाषा कोई भी हो वह हृदय और मस्तिष्क के कपाट खोलती है . व्यक्तित्त्व  का विकास करती है .  भाषा का महत्त्व तो स्वयंसिद्ध है . लेकिन यह  भी निर्विवाद है कि शिक्षा का सर्वोत्तम माध्यम मातृभाषा ही है ।

Friday, August 30, 2013

कुछ भी नहीं !

नोटों की दुनिया में 
इन्सान कुछ भी नही 
जीना है ,जीने का सामान 
कुछ भी नही !

हर सुबह अखबार
बिखराता आँगन में
ढेरों समस्याएं 
समाधान कुछ भी नही !

सुर्खियों में रहते हैं 
अतिचार ,अनाचार 
शेष है जो आदमी का 
ईमान कुछ भी नही ?

गाँव खेत छोड जबसे 
आगए हैं शहर में 
बेनाम रहते हैं 
पहचान कुछ भी नही ।

रिश्ते बचाना या 
रस्ते बनाना हो
दौड-भाग, भगदड में 
आसान कुछ भी नही ।

सूख गया एक पेड 
चिडियों में शोर है 
तह में हुआ क्या है 
सन्धान कुछ भी नही !

कल से नही लौटी 
माँ-बाप चिन्तित हैं 
बेटी किस हाल में हो 
अनुमान कुछ भी नही ।

आन--मान उम्र भी 
दरिन्दे कब देखते   
औरत है बस ,
आत्म-सम्मान कुछ भी नही !


Monday, August 19, 2013

सुनले मेरे वीर

तुझ पर सारे सुख न्यौछावर
सुनले मेरे वीर ।
खेतों की हरियाली तू है ,
तू नदिया का नीर ।

तेरे बिन बादल रीते हैं
गीत बिना मधुराई
आँगन में रौनक तुझसे है
जीवित है अमराई
टूटे--बिखरे रिश्तों को 
बाँधे तेरी जंजीर ,
तुझ पर सारे सुख न्यौछावर....।।

माँ उदास है 
नत निराश है 
तेरी राह तके 
रिश्तों की मंजिल तय करते 
उसके पाँव थके ।
भैया आकर गले लगाले 
हरले उसकी पीर, 
तुझ पर सारे सुख न्यौछावर... ।।

हम दोनों है मेरे भाई 
एक टहनी के फूल 
हमसे ही आबाद रहें 
अन्तर सरिता के कूल 
तुझसे ही तो रंग भरी है 
जीवन की तस्वीर ,
तुझ पर सारे सुख न्यौछावर 
सुनले मेरे वीर ,
खेतों की हरियाली तू है 
तू नदिया का नीर ।।

Wednesday, August 14, 2013

मेरे देश

मेरे देश अटल अविचल प्रिय
तू मेरा विश्वास ।
तुझसे ही है जीवन मेरा 
जाग्रत हैं अहसास ।

रची-बसी हैं मेरी साँसें

तेरे ही कण-कण में ।
तेरी राह चलूँ
अविजित रह 
बाधाओं से रण में 

तम मन धन तुझको अर्पित हैं 

तू मेरा अभिमान ।
तेरे हित जीने मरने में 
है मेरा सम्मान । 

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं ।

Thursday, July 25, 2013

दक्षता-संवर्धन

"मिसेज गोयल ! जरा इधर तो आइये ।"--परीक्षा-संयोजक नरेन्द्र ने नौवीं कक्षा की कक्षाध्यापिका रमा गोयल को पुकारा तो वह हडबडाई हुई आई ।
"क्या है सर ?"
"कुछ बच्चों को आपने फैल कर दिया ?"
"सर , ये तो वे बच्चे हैं जिन्हें ठीक से अपना नाम लिखना भी नही आता ।" 
"तो इसका अर्थ यह हुआ कि महीना भर के ब्रिज-कोर्स में आप बच्चों को नाम लिखना तक नही सिखा पाईं । और इससे भी बडा अर्थ यह हुआ कि आपको इन्हें फिर पढाना होगा  और फिर टेस्ट लेना होगा । अगर तब भी फैल होते हैं तो फिर पढाना होगा । पढाते रहना होगा  जब तक कि वे पोस्ट-टेस्ट में पास न हो जाएं । फैल करना यानी अपनी मुसीबत बढाना । "
"सर !!"----रमा हैरान और अवाक्..। 
"आप पच्चीस साल से नौकरी कर रही हैं । इतना हैरान होने की बात क्या है बताइये । याद है उस दिन ब्रजेश जी क्या समझा कर गए थे ?"
"जी सर ,पच्चीस साल से नौकरी तो कर रही हूँ पर यह ब्रिजकोर्स जैसी चीजें पहली बार देखीं हैं ।"
" जी हाँ मैडम ,पहली बार शासन सजग हुआ है शिक्षा के प्रति ..।"
"यह कैसी सजगता कि पहली से आठवीं तक धडाधड पास किए जाओ चाहे उसे पढना लिखना भी न आए और अब नौवीं में आकर टेस्ट का फिल्टर लगादो । ईमानदारी से सोचिये कि उसमें से  छन कर कितने बच्चे आएंगे सर ! कितना अच्छा होता कि यह सजगता आरम्भ से दिखाई जाती । बेहतर हो कि या तो फैल हुए बच्चों को फिर से आठवीं में भेज दिया जाए या फिर उन्हें छह माह तक केवल अच्छी तरह पढना लिखना सिखाया जाए ताकि वे कुछ तो कोर्स की पढाई करने लायक हो जाएं । ...सर कमजोर को पास करना तो....।  " 
" ओफ्..ओ ...रमा जी , आप तो उन्नति की बजाए अवनति का मार्ग दिखा रहीं हैं शासन को । और कौन सुनेगा आपकी । मध्याह्न भोजन की योजना जब शुरु हुई थी तब हर समझदार व्यक्ति ने इससे पढाई के नुक्सान की बात कही थी पर शासन ने तो यह सोचा ही नही । स्कूल विद्यालय की जगह भोजनालय बन कर रह गए । उसमें भी होरहे घोटाले और दुर्घटनाएं एक अलग मुद्दा है । रमा जी, आप कोई नियम निर्धारक हैं ? शिक्षाविद् है ? नही न ? अपन लोगों का काम है केवल नियम-पालन करना । आपको याद तो होगा जो ब्रजेश जी ने प्रशिक्षण के दौरान कहा था ।"
"मुझे खूब याद है सर । उन्होंने बताया था कि छात्रों के दक्षता-संवर्धन और हाईस्कूल के बेहतर परीक्षा परिणाम हेतु नौवी कक्षा में प्रवेश के लिये प्री-टेस्ट लेना है । इसमें जो फैल होते है उन्हें पढाने के लिये ब्रिज-कोर्स नाम की एक पाठ्यवस्तु है । उसे पढाने के बाद फिर से एक पोस्ट-टेस्ट लेना है और टेस्ट में पास बच्चों को नौवीं कक्षा का कोर्स पढाना है । "
" वाह--वाह.. आपने खूब याद रखा है "--नरेन्द्र मुस्कराया ।
"लेकिन आपको यह याद नही कि पोस्ट-टेस्ट में छात्र का फैल होने का मतलब है कि आपने कुछ पढाया ही नही । यानी कि कार्य में शिथिलता दिखाई जबकि एक पूरा महीना आपके पास था ।" 
"सर जो काम आठ साल में न हो सका ,वह भला एक महीने में कैसे हो सकता है । ब्रिज कोर्स में संज्ञा ,सर्वनाम ,वाक्य उपसर्ग, प्रत्यय अलंकार आदि पढाने हैं । वही आठवीं के पाठ्यक्रम की पुनरावृत्ति । पढना लिखना नही सिखाना । लेकिन उन्हें तो ठीक से पढना भी नही आता । सोचिये सर जब तक भाषा का आधार मजबूत नही होगा यानी पढने व लिखने की योग्यता नही होगी बच्चा इन बातों को कैसे सीखेगा ?" 
"यही तो परख है आपकी योग्यता की कि कौनसी जादू की छडी है कि आप बच्चों को चुटकियों में वह सब सिखादें जो वे आठ साल में नही सीखे ..। नही सिखा पाते तो इसका मतलब है कि आपमें सिखाने पढाने की योग्यता है ही नही ..।"
 रमा चुप । नरेन्द्र ने समझाया --"मैडम सबसे आसान तरीका है ,बच्चों को पास किए जाओ । चाहे वे लिखें या न लिखें । आब्जेक्टिव को अपने हाथ से सही करदो । 'सुरे' का 'सूर्य' और 'सरनम' का 'सर्वनाम' ही तो करना है । पास करो और छुट्टी पाओ । जैसे अब तक पढते आए हैं वैसे ही आगे पढाते जाओ । हाईस्कूल परीक्षा-परिणाम के लिये भी कुछ सोचा जाएगा । शासन भी तो यही चाह रहा है नही तो ऐसे ...। खैर छोडो.....दरअसल यह परीक्षा बच्चों की नही अपनी मानो मैडम । इसमें आपको कैसे पास होना है बस इसी पर ध्यान दो । बाकी तो......।"

Tuesday, July 23, 2013

पलायन

कब तक !
आखिर कब तक 
मेरा विश्वास जमा रहता
तुम्हारे दरबार में ।
अंगद के पाँव की तरह ।

शत्रुता निभाने के लिये ही सही ।
तुम्हारे पास तो नही है
रावण जैसी ईमानदारी भी
कि अपना अन्त सुनिश्चित जानते हुए भी
रावण ने युद्ध का मैदान नही छोडा ।
नही किया समर्पण ,संकल्प नही तोडा,
दूत अवध्य था उसके लिये शत्रु का भी
तभी तो अंगद जमाए रहा अपना पाँव
एक वीर के दरबार में 
वीर की ही तरह ।

निभाना उचित है, आसान भी 
शत्रु से शत्रुता और मित्र से मित्रता 
लेकिन पता ही नही चलता कि 
तुम मित्र हो या शत्रु ।
जताते रहे हो 
कभी विश्वास 
तो कभी सन्देह ।
कभी शत्रुता तो कभी स्नेह
मिटाने की लालसा और 
सुरक्षा का भरोसा
भावों के दूत का वध भी
तुम करते ही रहे हो हमेशा
बिना किसी झिझक या ग्लानि के ।

फिर कैसे जमा रह सकता था
मेरा स्नेह और विश्वास
तुम्हारे दरबार में ।
हटा लिये अपने पाँव चुपचाप
बिना कोई दावा किये ।
भला कौन चाहता है यों
छल-बल और धोखे से मरना 


Monday, July 22, 2013

देखें---'सुनहरे पन्नों का खजाना '

भाई लोकेन्द्र सिंह राजपूत ने  -- 'मुझे धूप चाहिये' अभी हाल ही पढी  है और पढ कर जो कुछ लिखा है उसे आप भी अवश्य पढें । लिंक----
http://apnapanchoo.blogspot.in/

Monday, July 8, 2013

वह अजनबी

------------------

वह , 
जो देखता रहता है चुपचाप
उफनती हुई नदी में
डूबते हुए आदमी को
तटस्थ रहकर  
उसे समझ है कि
डूबते हुए को बचाना,
हो सकता है खुद भी डूब जाना ।
या कि हिसाब लगा लेता है वह 
बचाने पर हुई हानि या लाभ के 
अनुपात का...,
हमारे शहर का तो नही है
आया है कहीं दूर से ।

वह हमारे मोहल्ला का तो नही है ,सच्ची
वह जो भीड में रहकर भी
भीड से अलग है
मुसीबतों से विलग है ।
आता है उसे खुद को 
बचा लेना ,धूल कीचड और काँटों से
पहन रखे हैं उसने 
कठोर तल वाले जूते ।
क्या परवाह कि
रौंदे जाते हैं कितने ही जीव -जन्तु
उसके यूँ चलने से ।

वह हमारी गली का नही हो सकता 
जो निरपेक्ष रहता है सदा
कंकरीट की दीवार सा
बेअसर रहते हैं हमेशा 
आँधी--तूफान ,ओले ,भूकम्प....
हर तबाही को देखता है 
नेता या किसी न्यूज-चैनल की तरह ।
  
मैं क्या करूँ उससे मिल कर  
जो स्वयं को दिखाता है अति व्यस्त 
बिना कार्य ही कार्य-भार से त्रस्त  
रहता है हमेशा यंत्रवत् ।
देता है अधूरा सा जबाब
किसी क्लर्क की तरह 
दस बार पूछने पर भी 
अटका रहता है पूछने वाला,
एक पूरे और सही
जबाब के लिये ।   
वह यकीनन नही है 
मेरे घर का ,कोई मेरा अपना ।

Tuesday, June 25, 2013

'समय के चित्र फलक पर '

'समय के चित्रफलक पर ' श्री प्रकाश मिश्र जी का काव्य-संग्रह है । मेरा विश्वास है कि आप में से कई जानते भी हों कि ये स्व. श्री आनन्द मिश्र जी (चन्देरी का जौहर,और कलिंग आदि प्रबन्धकाव्यों के रचयिता ) के अनुज हैं और ग्वालियर के उन साहित्यकारों में से हैं जो देश भर में दूर-दूर तक अपनी कविताओं का परचम फहरा चुके हैं । यह बात अलग है ( अफसोसजनक भी )कि मैं उनसे दो वर्ष पहले ही मिली जब ध्रुवगाथा के लिये उनसे कुछ लिखवाना था । यों पहले भी एक-दो बार उनका काव्यपाठ सुना था पर केवल नाम से । तब उन्होंने भी मुझे  अपना यह संग्रह दिया । इसे पढने से पहले मैं उन्हें केवल मंच का कवि समझती थी लेकिन पढकर जो कुछ पाया उसे आपके साथ बाँटना जरूरी लगा । यह उनकी कविता का पूरा मूल्यांकन तो नही है फिर भी इतना तो जरूर कि मैं उनकी कविता को काफी कुछ समझ पाई हूँ । 
 ------------------------------------------------------------
चट्टान फोड कर उगे ,अंकुर की कथा लिख
अन्धों को दिखा रास्ता, गूँगों की व्यथा लिख.....
रोटी की तरह आग में सिकने के लिये लिख
बिकने के वास्ते नही ,लिखने के लिये लिख"......
        ये पंक्तियाँ  श्री प्रकाश मिश्र जी के काव्य-संग्रह 'समय के चित्र-फलक पर' (पृष्ठ 5 ) से ही उतारी गईं हैं । किसी प्रसिद्ध साहित्यकार ने उन्हें 'आदमकद 'कवि कहा है ।  उनके उच्च व विस्तृत भाव-लोक को देख कर  मुझे भी यह शब्द पूर्ण उपयुक्त प्रतीत होता है । उन्होंने प्रभूत मात्रा में नही लिखा लेकिन जितना लिखा है ,कद को ऊँचाई देने के लिये पर्याप्त है ।
जब कविता( बिकने का प्रलोभन त्याग कर ) सिर्फ लिखने के लिए लिखी जाती है , और पूरी तरह जीते हुए लिखी जाती है तब वह नदी की तरह बहती है । अंकुर की तरह फूटती है और उजाले की तरह फैलती है । कविता केवल अपनी बात कहती है । बात, जो अन्तर--मंथन से बाहर निकलती है क्योंकि उसका निकलना अनिवार्य होजाता है । ऐसी कविता अपने आपको सुनाने के लिये रची जाती है किसी को लुभाने के लिये नही । वह प्रक्रिया तो कविता पढ-सुनकर स्वतः ही होजाती है 
आदरणीय श्री प्रकाश मिश्र जी की कविताएं सुनते व पढते हुए ऐसा ही अनुभव होता है । वे कविता को कण-कण जीते हुए खुद को ही सुनाने के लिये लिखते हैं । उनके शब्द साँसों से निकलते हुए और चट्टान फोड कर निकले हुए अंकुर से प्रतीत होते हैं । उनकी कविताएं जैसे धरती में दूर तक जडें फैलाए हुए मजबूत दरख्त हैं । दरख्त ,जो धरती की नम उर्वरता और सृजनात्मकता के प्रतीक होते हैं ।
कोई रचनाकार जब पूरे परिवेश को साथ लेकर चलता है ,अतीत के स्पर्श की अनुभूतियाँ समेटे वर्त्तमान की धरती पर खडा, भविष्य को आँक लेता है तब वह समय के चित्र-फलक पर एक कालजयी चित्रांकन करता है । मिश्र जी की कविताओं में ऐसा ही कुछ देखने मिलता ङै । उनकी अनुभूतियों में 'दिनकर' ,बच्चन, भवानीप्रसाद मिश्र , इकबाल आदि का आकाश है तो कबीर और निराला की ठोस धरती भी है । उनकी कविता का मूल स्वर प्रगतिवादी है । आराम और सुविधाएं उन्हें रास नही आतीं । ठहरी हुई व्यवस्था के वे विरोधी हैं । उनकी कविता प्रकृति के सौन्दर्य पर निहाल होने की बजाय रेशा-रेशा हुई रामदीन की माँ के श्वेत केशों में आत्मीयता के साथ रच-बस जाती है---
दिन भर भरे रजाई गद्दे ,डोरे टाँक रही है 
कर्मठ हाथों से भविष्य के सपने आँक रही है 
सारा जीवन चुभती हुई सुई रामदीन की माँ....।" ( पृ.52)
और गंगाराम की दशा से करुणा विगलित होजाती है---
"अ आ इ ई के जमघट में खुशियाँ बाँटरहे हैं ,
बीडी पीते हुए जाग कर ,रातें काट रहे हैं 
शाला के सनमुख बेचें गुब्बारे गंगाराम 
भटक रहे हैं गली-गली बनजारे गंगाराम ।" (पृ53)
ऐसी ही अनेक कविताओं से सम्पन्न है-- काव्य-संग्रह समय के चित्र फलक पर । ' दरख्त ' 'तबला बजा रहे हैं', 'कहीं तुम', 'संवेदना-बोध', 'मेघ-प्रतीक्षा ',अजगर' रामदीन की माँ ,आदि अधिकांश कविताएं प्रगतिवादी धरती की संवेदना से ही उगी और फैली-फलीं हैं, यही नही उनकी गजलें भी उर्दू की पारम्परिक सीमाओं के पार जाकर दुष्यन्त कुमार और अदमगोंडवी की दिशा में ही अपनी राह बनाती हैं । दृढ विश्वास के साथ । कुछ उदाहरण देखें---
"नदियों के होंठ सूखे हैं,समन्दर नहीं रहे 
बँगले हैं, कोठियाँ हैं मगर घर नही रहे ।
..................
लोगों ने शीशदान दिये मुल्क के लिये 
अब टोपियाँ बहुत हैं मगर सर नही रहे ।"( पृ.31)
-----------------------------------
"कितनी कटी हराम में ,कितनी हलाल है
ये जिन्दगी भी जैसे गणित का सवाल है ।
लिक्खेगा झूठ देगा सदाकत  का फैसला
जादू है उसके शब्द कलम भी कमाल है ।
.........
जो गिर गया था रेल से अनजान ही तो था 
मैं बहुत दूर था ,मुझे इसका मलाल है ।"...( पृ34)
---------------------------------------------
"लडाई में कहीं भी कार्ड क्रैडिट के नही चलते 
यहाँ केवल भुजाएं और सीना काम आता है ।
तुम्हारी मंजिलें हैं सिर्फ मेहनत ,वक्त की कीमत
अगर छत पर पहुँचना हो तो जीना काम आता है ।"( पृ 36)

मिश्र जी की गजल भी महलों से निकल गाँवों की धूल में मचलती है । फुटपाथ पर सोए बचपन को देख पिघलती है । जब कवि ने लिखा कि ---"टूट कर गिर गया है संभालो उसे ,वो अभी आदमी है बचालो उसे " या ---"भटका देंगी तुम्हें किताबें ,पढने में मत वक्त गँवाओ 
बात मत करो बुद्धि वाली भेडों की रेवड होजाओ । "....,वे बुद्धिवादिता का ढिंढोरा पीटने की बजाय इन्सानियत के पक्ष में प्रखरता से खडे दिखाई देते हैं । 
"..............
ये सावन का महीना भी गरीबों को मुसीबत है 
बुझे चूल्हे से खिडकी और छप्पर बात करते हैं ...
लहू अय्याशियों के वास्ते चूसा गया जिनका
परिंदे खोगए ,टूटे हुए पर बात करते हैं ।
अदब वाली सभाओं का असल में कायदा ये है 
नदी खामोश रहती है समन्दर बात करते हैं ।"
मिश्र जी संघर्ष के कवि हैं ,आराम के नही । अभावों और विसंगतियों के कवि हैं ,प्रेम के नही । उन्हें रोना नही ,मुसीबतों को लताडना पसन्द है । उमडते बादलों को देख उन्हें किसी रूपसी का वियोग या प्रेमी का उद्दीपन नही ,सूखा पीडित कर्जदार किसान की राहत दिखाई देती है । इनकी प्रकृति भी (आलम्बन रूप में ही) प्रगतिवादी बाना पहने हुए है । कहीं उसका उद्दीपक रूप है भी तो वह क्षोभ और विद्रोह को उभारने के लिये है । अन्तर की आग का शमन करने में बारिश की बूँदें अक्षम हैं । खाली पेट चाँद-सितारों की चर्चा व्यर्थ है । बादल नेताओं की तरह झूठे और मक्कार हैं प्यासे खेतों को खाली आश्वासन देते हैं । जब मिश्र जी की संवेदना धूप के पक्ष में होती है ---"छाया के सेठ हैं निठुर कैसे ,मुट्ठी भर अन्न के लिये कहाँ-कहाँ लडती है धूप.." तब--निराला जी की 'कुकरमुत्ता' याद आती है । उपमानों का सर्वांग उलट-फेर । गुप्त जी ने प्रकृति को इसी सन्दर्भ में 'अति-आत्मीया' कहा है । हृदय जब रोष व असन्तोष से भरा हो तो कहाँ रमणीयता और कहाँ मादकता । चट्टानों में लहूलुहान होते अहसासों को उपमान कैसे मोहक लगेंगे भला । बादल के ये बिम्ब इस बात के जीवन्त गवाह हैं---
"उमड-घुमड मस्ती में झूमें ,
नीलगगन की सडकों पर घूमें
कुछ पल भटके उच्छ्रंखल युवाओं से
बरस जाते दर्द की दवाओं से 
बहुचर्चित चरित्रों जैसे ,
आधुनिक कला के चित्रों जैसे "...(60)
"नक्सलवादी धूप" को कैसे उपमान दिये हैं कवि ने देखिये---
वर्तमान युवा असन्तोष सा 
दहकने लगा सारा आँगन 
दल बदलू नेता जैसा है 
छाया का अस्थिर भाषण ....। "(70)
मिश्र जी का काव्य-फलक निश्चित ही  बहुत विस्तृत है । उसमें जीवन-जगत की तमाम विसंगतियाँ ,अभाव ,क्लान्ति साथ ही उनके प्रति फटकार भी समाई हुई है । वे आदमी के 'कोल्हू का बैल' बन जाने का तीव्र विरोध करते हैं । वे मरे हुए सपनों का उत्सव नही मनाते । उन्हें फूल बन कर महकने की बजाए अतिचारियों के लिये शूल बनना पसन्द है । सच तो यह है कि उनकी कविता वह कविता है जो "खण्डहरों से निकल कर" आई है । जिसे लिखने के लिये "दिल का लहू दरकार "होता है ।
"हमारी आँख के आँसू तुम्हारी आँख से बरसें,
अगर मिल जाए ये दौलत तो फिर खोई नही जाती "--श्री मिश्र जी की रचनाएं उन्ही से सुन कर यही दौलत मिल जाती है । वे चौंका देने जैसा कुछ लिख कर चर्चित होने की आकांक्षा नही रखते । 
श्री प्रकाश मिश्र जी को सुनने का सुअवसर मुझे एक-दो बार मिला तब निश्चित ही उनकी ओजमय प्रस्तुति ,मेघ-गर्जन सी बुलन्द आवाज और झरने की तरह आन्दोलित और प्रवाहित होती कविता मुझे सबसे अलग लगी थी । प्रायः ऐसा देखा गया है कि प्रस्तुति ही सामान्य कविता को विशिष्ट और विशिष्ट कविता को सामान्य भी बना देती है । लेकिन एक सार्थक, सहज लेकिन गंभीर रचना को उतनी ही प्रभावोत्पादकता के साथ सुनाना श्री मिश्र जी को सबसे अलग बनाता है । वे जब कविता सुनाते हैं तब लगता है कि कविता गले से नही बल्कि कहीं बहुत गहरे अन्तर को खरोंचती हुई ,तंत्रिकाओं को उद्वेलित करती हुई निकल रही है । वे कहते हैं कि "कविता को खुद बोलना चाहिये ।"....तो उनकी कविता बोल ही नही रही है चीख रही है ..। ऐसी चीख जो केवल हृदय को सुनाई दे । और एक जोश ,एक संवेदना और एक तप्ति ( कुछ सार्थक सुन पाने की ) में निमग्न करदे । अभिव्यक्ति की व्यग्रता मिश्र जी में अभी भी स्पष्ट देखी जासकती है । यही है उनके काव्य की प्रासंगिकता और सार्थकता का प्रमाण । 
जब मैंने उनका यह काव्य-संग्रह पढा और अपनी रचनाओं के सन्दर्भ में चार-छह बार उनके घर जाने का सौभाग्य मिला तब मेरे सामने और भी नए क्षितिज खुले । सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि श्री मिश्र जी को कवि के रूप में और एक व्यक्ति के रूप में जानना अलग नही है । उनकी बातों में ,विचार एवं व्यवहार में बिल्कुल वही सच्चाई है जो उनकी रचनाओं में दिखती है । पहले ही कहा जा चुका है कि वे कविताएं अपने आपको सुनाने के लिये लिखते है यही कारण हैं कि अपनी रचनाओं को सहेजने की सजगता व तत्परता नही रही । अचानक तुडे-मुडे कागज पर लिखी ,किसी पुरानी किताब में दबी मिली कोई रचना उन्हें चौंका देती है----"अरे इसकी तो मुझे याद ही नही थी । "
संभव है कि इस तरह कई रचनाएं अँधेरे में खो चुकीं हों । मुझे विस्मय हुआ कि उनकी बहुचर्चित और लोकप्रिय कविताएं ---ताजमहल, बम्बई के लावारिस बच्चे , जी हाँ हुजूर, प्लेटफार्म आदि इस संग्रह में हैं ही नही । बल्कि वे कहीं भी लिपिबद्ध नही हैं । श्रोताओं के आग्रह पर वे मंच से इतनी बार सुनाई गईं हैं कि कंठस्थ होगईं हैं । मैंने उन्हें लिपिबद्ध कराने का आग्रह किया ।
मेरा सौभाग्य है कि पितृतुल्य आदरणीय श्री मिश्र जी के पास बैठ कर मैं उनसे कई सुन्दर और प्रेरक प्रसंग सुन सकी हूँ । उनको पढना और सुनना वास्तव में सच्ची कविता और सच्चे रचनाकार से मिलना है ।